जयपुर : इस्कॉन रोड स्थित अमृत नगर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने राग और द्वेष से मुक्ति को ही धर्म का वास्तविक स्वरूप बताते हुए गहन आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया।
अपने प्रवचन में उन्होंने कहा कि जिस कर्म में राग और द्वेष का मिश्रण होता है, वह संसार के बंधन का कारण तो बन सकता है, किंतु आत्मा की शुद्धि का मार्ग नहीं बन सकता। आत्मा की पवित्रता तभी संभव है जब मनुष्य इन दोनों भावों से पूर्णतः मुक्त हो जाए। इसी कारण वास्तविक धर्म का सार राग–द्वेष से मुक्ति में ही निहित है।
धर्मसभा का आयोजन इस्कॉन रोड स्थित अमृत नगर में हुआ, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आध्यात्मिक प्रवचन का श्रवण किया।
राग और द्वेष : कर्म बंधन के मूल कारण
मुनि श्री ने कहा कि संसार में कर्म बंधन के दो मुख्य कारण राग और द्वेष हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि द्वेष को समझना अपेक्षाकृत सरल है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष रूप में प्रकट होता है, जबकि राग अधिक सूक्ष्म और आकर्षक होने के कारण उसे पहचानना कठिन होता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बिल्ली अपने तीखे दाँतों से चूहे को पकड़ती है और उन्हीं दाँतों से अपने शावकों को भी उठाती है—बाहरी क्रिया समान होते हुए भी भाव की भिन्नता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। चूहे के प्रति द्वेष स्पष्ट होता है, जबकि अपने बच्चों के प्रति राग की सूक्ष्म भावना सहज रूप से समझ में नहीं आती।
उन्होंने यह भी कहा कि आज का समाज रागात्मक प्रवृत्तियों की ओर अधिक आकर्षित है और उन्हें ही कई बार श्रेष्ठ या स्वीकार्य मान लेता है, जिससे राग और अधिक सशक्त हो जाता है।
रागात्मक आकर्षण और आध्यात्मिक दृष्टि
प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि राग से जुड़ी प्रवृत्तियाँ समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेती हैं, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से वही प्रवृत्तियाँ आत्मिक बंधन का कारण बनती हैं। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य बाहरी आकर्षण के स्थान पर आत्मिक सत्य को समझे और विवेकपूर्ण दृष्टि विकसित करे।
सामाजिकता और आध्यात्मिकता की भिन्न दिशा
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि समाज सामान्यतः राग की ओर आकर्षित होता है, और जब रागात्मक व्यवहार को ही धर्म के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका आकर्षण और अधिक बढ़ जाता है।
उन्होंने आचार्य भिक्षु स्वामी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिकता और आध्यात्मिकता दो भिन्न मार्ग हैं, जिन्हें एक मान लेना उचित नहीं है। दोनों की दिशाएँ अलग हैं—जैसे पूर्व और पश्चिम—और दोनों का अपना-अपना महत्व है, परंतु उनका मिश्रण उनके वास्तविक उद्देश्य को समाप्त कर देता है।
कार्यक्रम का समापन
धर्मसभा का शुभारंभ तीर्थंकर स्तुति के साथ हुआ। इसके पश्चात श्रद्धालुओं को समत्व की अनुभूति हेतु श्वास प्रेक्षा का अभ्यास कराया गया। कार्यक्रम का समापन मंगलपाठ के साथ हुआ, जहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं ने शांति, संयम और आत्मिक स्थिरता का अनुभव किया।













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