लखनऊ:कॉमन सिविल कोड का मुद्दा चुनाव में किस करवट बैठेगा-इसको लेकर समाजवादी पार्टी उलझन में दिखती है। इसलिए इसका दबी जुबान से विरोध जताने के बाद अब इसे ज्यादा तूल देने के मूड में नहीं है। पार्टी का अहसास है कि अगर उसने इस पर मुखर होकर इसके खिलाफ आवाज उठाई तो भारतीय जनता पार्टी इस पर उसे घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी।
सपा प्रमुख पीडीए को लेकर खासे मुखर हैं। यह एक तरह से सपा के 2022 के फार्मूले का विस्तार ही है। इसी के आधार पर सपा ने अपना सामाजिक जातीय समीकरण इस तरह बिठाया जिससे उसके विधायकों की तादाद 47 से बढ़कर 111 हो गई। हालांकि सरकार बनाने का उसका मंसूबा दुबारा भी नहीं पूरा हो पाया। पर पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 2022 के विधानसभा चुनाव में बेहतर परफार्मेंस दी।
सपा ने रणनीति के तहत टिकट वितरण में गैरयादव पिछड़ा, दलित व अल्पसंख्यकों को तवज्जो दी थी। पीडीए भी इसी से निकला मुद्दा है। सपा का मानना है कि जातीय जनगणना कराने की मांग व पिछड़ों, दलितों को उसका हक दिलाने का सवाल उठाने व इसे जनता के बीच ले जाने से इस वर्ग को अपने पक्ष में लामबंद किया जा सकता है।
भाजपा के जवाब में आया सपा का नारा
सपा मुख्यालय के बाहर लगे नए होर्डिंग चर्चा में हैं। इनमें बीच में लिखा है इस बार पीडीए सरकार। यह एक तरह से भाजपा के नारे- ‘अब की बार मोदी सरकार’ की नकल भी है और जवाब भी। होर्डिंग में डॉ अम्बेडकर, राम मनोहर लोहिया, मुलायम सिंह, एपीजे अब्दुल कलाम व जनेश्वर मिश्र का चित्र लगाया गया है। पार्टी ने सवर्णों के लिए भी जगह छोड़ी है और एपीजे अब्दुल कलाम के नाम को भी आगे किया है।













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