वेसु, सूरत (गुजरात) : आत्मा के कल्याण के लिए धर्म, ध्यान व अध्यात्म की साधना का महापर्व पर्युषण गतिमान है। सूरत के हजारों श्रद्धालुओं सहित बाहर से भी जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में पहुंच कर इस अवसर का लाभ उठा रहे हैं। प्रातः सूर्योदय से पूर्व से लेकर देर रात तक बहने वाली आध्यात्मिक गंगा में डुबकी लगाकर लोग अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास कर रहे हैं। गुरुवार को पर्वाधिराज पर्युषण का पांचवा दिवस था, जिसे व्रत चेतना दिवस के रूप में समायोजित किया गया।
महावीर समवसरण में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। मुनि अभिजितकुमारजी ने भगवान मल्लीनाथ के जीवन का वर्णन किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने दस धर्मों में वर्णित संयम धर्म पर अपनी अभिव्यक्ति दी। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने संयम धर्म पर आधारित गीत का संगान किया। व्रत चेतना दिवस पर आधारित गीत का संगान साध्वी मैत्रीयशाजी व साध्वी ख्यातयशाजी ने किया। साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभाजी ने व्रत चेतना दिवस पर उपस्थित जनता को मंगल प्रतिबोध प्रदान किया।
भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को महावीर समवसरण से ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि नयसार की आत्मा जब भगवान ऋषभ के पौत्र व चक्रवर्ती भरत के पुत्र मरिचि के रूप में हुए और अपने दादा से प्रेरणा लेकर साधु और बने और अलग ढंग से साधना करने लगे। आचार्यश्री इसके माध्यम से परिषहों को जितने की प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने साधुओं को किसी भी प्रकार के परिषहों को सहन करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन में घमण्ड नहीं करना चाहिए। रूप, शक्ति, पैसा, धन आदि-आदि अनेक अनुकूलताओं का घमण्ड नहीं करना चाहिए। मरिचि के जीवन का क्रम पूर्ण हुआ और वहां से पांचवें देवलोक में उनकी आत्मा उत्पन्न हुई। देवगति का आयुष्य पूर्ण हुई।
आचार्यश्री ने व्रत चेतना दिवस के संदर्भ में उपस्थित श्रद्धालु जनता को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि इस बार हमने चिंतन कर इसका नाम व्रत चेतना दिवस कर दिया। श्रावक यदि बारह व्रतों को स्वीकार कर लें तो उसके जीवन का कितना कल्याण हो सकता है। कितने करण और कितने योग से त्याग हो रहा है, इसका महत्त्व होता है। सघन साधना शिविर का भी शुभारम्भ 2023 में आयोजित हुआ। इस बार पुरुष और बाइयों दोनों शिविर होने वाला है। इस बार प्रेक्षाध्यान कल्याण वर्ष भी 30 सितम्बर से प्रारम्भ होने वाला है। इनसे जुड़कर साधना की जा सकती है। श्रावक अपने जीवन में यथासंभव त्याग आदि करने का प्रयास करना चाहिए। हमारे साधु-साध्वियां भी तपस्या करते हैं। यह सब भी व्रत को पुष्टि करने वाला है। इस प्रकार आदमी के जीवन में व्रत की चेतना रहे। जितना त्याग, संयम बढ़ेगा, वह आत्मकल्याण के लिए श्रेयस्कर होगा। गृहस्थ कपड़ा, आभूषण आदि के प्रति भी संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने इस अवसर पर अणुव्रत गीत का आंशिक संगान किया।
मंगल प्रवचन के उपरान्त अनेक तपस्वियों ने अपनी-अपनी धारणा के अनुसार आचार्यश्री से तपस्या का प्रत्याख्यान किया।













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