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Home आराधना-साधना

इन्द्रिय विषयों के प्रति हो अनासक्ति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ प्रबोध के संगान व व्याख्यान से भी लाभान्वित हुए श्रद्धालु

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July 25, 2025
in आराधना-साधना
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इन्द्रिय विषयों के प्रति हो अनासक्ति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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कोबा, गांधीनगर (गुजरात) : शुक्रवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि पांच इन्द्रिय विषयों को दृष्ट कहा जाता है। मानव शरीर में पांच इन्द्रियां होती हैं। इन पांच इन्द्रियों के पांच विषय होते हैं और पांचों इन्द्रियों की पांच प्रवृत्तियां भी होती है। जैसे स्रोत्रेन्द्रिय अर्थात- कान। इसका विषय है शब्द और इसकी प्रवृत्ति है- सुनना। इसी प्रकार आंख से देखना, नाक से सूंघना, जिह्वा से स्वाद लेना और स्पर्श से छूना। इन सभी का अपना-अपना विषय और प्रत्येक की अपनी-अपनी प्रवृत्ति। जिसके पास श्रवण शक्ति होती है, वह निश्चय ही पंचेन्द्रिय प्राणी होता है। सुनने की क्षमता सभी प्राणियों मंे नहीं होती।

कान से आदमी सुनता है। शब्द कान में आते हैं। शब्दों के प्रति आदमी के मन में राग भी हो सकता है और द्वेष भी हो सकता है। आगम में बताया गया कि इन्द्रिय विषयों में स्वाद लेने से बचने का प्रयास करना चाहिए, इनके प्रति आसक्ति नहीं लेनी चाहिए और द्वेष भी रखना चाहिए। शब्दों के प्रति आदमी के मन में राग भी हो सकता है और द्वेष भी हो सकता है। अहिंसा की साधना करने के लिए अनासक्ति की साधना करनी भी अपेक्षित होती है। दृष्टों के प्रति राग होता है तो आदमी हिंसा में भी प्रवृत्त हो सकता है। इसलिए अहिंसा की साधना करने के लिए इन्द्रिय विषयों के प्रति अनासक्त रहने की भी अपेक्षा होती है। आंख का विषय है- रूप। आदमी आंख से देखता है और देखने से उसके मन में राग भाव भी जुड़ सकता है। भौतिकता की चकाचौंध के रूप आंखों को लुभा सकते हैं। इनके प्रति राग की भावना भी जागृत हो सकता है। इसलिए आदमी को रूपों के प्रति भी अनासक्ति भी रखने का प्रयास करना चाहिए।

इसी प्रकार आदमी को गंध, रस तथा स्पर्श के प्रति भी अनासक्ति की चेतना का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आदमी को रसनेन्द्रिय और स्पर्श की अनासक्ति से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। विषयों के आकर्षण के कारण आदमी दूसरों को कष्ट भी देने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए आदमी को विषयाकर्षण से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को विषयों में अनासक्ति को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। आकर्षण होता है तो आदमी पवृत्ति करता है और उसके लिए आदमी हिंसा-हत्या तक भी पहुंच जाता है। इसलिए आदमी को अपनी प्रवृत्ति को बदलने का प्रयास करना चाहिए। भौतिकता का उपयोग आवश्यकतानुसार उपयोग किया जाता है, लेकिन आवश्यकतानुसार से ज्यादा समय नहीं लगाने का प्रयास करना चाहिए। अत्याधुनिक उपकरणों यथा मोबाइल आदि की उपयोगिता में भी सीमा और संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। बाह्य आकर्षण की दुनिया में आदमी को भौतिकता के आकर्षण को छोड़कर अपने चित्त को अध्यात्म में लगाने का प्रयास होना चाहिए। अध्यात्म की साधना में भौतिकता का साधन छोड़ना अत्यावश्यक होता है।

आचार्यश्री ने आगम द्वारा पाथेय प्रदान करने के उपरान्त ‘तेरापंथ प्रबोध’ आख्यान माला का भी सुमधुर संगान कर श्रद्धालुओं को भावविभोर बना दिया। त्रिदिवसीय उपासक समिनार के अंतिम दिन पूज्य सन्निधि में भी उपक्रम चला। इस संदर्भ में उपासक श्रेणी के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि योगेशकुमारजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। उपासक श्रेणी के संयोजक श्री सूर्यप्रकाश श्यामसुखा ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री के सम्मुख ‘उपासक श्रेणी: परिचय एवं प्रगति विवरण’ नामक पुस्तिका को लोकार्पित किया गया। उपासक श्रेणी ने गीत को प्रस्तुति दी।

आचार्यश्री ने इस श्रेणी को आशीष प्रदान करते हुए कहा कि उपासक श्रेणी हमारे धर्मसंघ की संपदा बन रही है। हमारे धर्मसंघ में अनेक संस्थाएं हैं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में यह श्रेणी वर्षों से वर्धमान है। इस कुछ अंशों में गौरव भी किया जा सकता है। उपासक श्रेणी धीरे-धीरे संसार और परिवार से निवृत्ति और धर्म में प्रवृत्ति बढ़ती जाए। यह उपासक श्रेणी रूपी संपदा और वृद्धिंगत होता रहे।

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