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Home आराधना-साधना

कर्म फल में कोई नहीं बनता सहयोगी, इसलिए बुरे कर्मों से बचे : युगप्रधान आचार्य महाश्रमण

शांतिदूत ने किया कर्म सिद्धांत को व्याख्यायित

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
September 9, 2025
in आराधना-साधना
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गांधीनगर:सुख दुख व्यक्ति के अपने अपने होते है। व्यक्ति पाप कर्म करता है तो पाप का फल भोगना होगा वहीं पुण्य कर्म किया है तो पुण्य का फल मिलता है। जिसने जो कर्म किया उसका फल उसी को भोगना पड़ता है। व्यक्ति यह सोचे मेरे कर्म मुझे भोगने है, दूसरे के कर्म दूसरे को भोगने पड़ेंगे। इसलिए में कर्मों का बंधन ना करूं। कर्म फल के समय कोई उसमें सहभागी नहीं बन सकता। उपरोक्त विचार युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने मंगलवार को कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में व्यक्त किए। आगम आधारित प्रवचनमाला के अंतर्गत प्रतिदिन प्राकृत सूत्रों की विवेचना के साथ गुरूदेव की धर्म देशना लोगों को लाभान्वित कर रही है।

गुरूदेव ने आगे कहा कि आयारों आगम का कथन है कि सुख दुख अपना अपना ही है। व्यक्ति को पापों से बचकर धर्माचरण की ओर बढ़ना चाहिए। कोई बच्चा अविकसित पैदा होता है व उसी का भाई पूर्ण विकसित होता है। यह सब पिछले पुण्य पाप का ही प्रभाव है। बीमार होना असात वेदनीय कर्म के कारण होता है तो वहीं स्वस्थ होना सात वेदनीय का बंध होता है। छोटी उम्र में पदों पर आकर यश पाना व चेहरे का सुंदर होना भी पिछले कर्मों का फल है। इसलिए व्यक्ति कर्म सिद्धांत को समझते हुए जीवन में बुरे कार्यों से बचें। करणी आपो आपरी, कुण बेटों कुण बाप।

आज के समारोह में अणुव्रत विश्व भारती द्वारा अणुव्रत गीत गायन सहित कई प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतिवर्ष अणुविभा द्वारा होने वाली इन प्रतियोगिताओं में इस वर्ष 25 राज्यों की 3175 स्कूलों के लगभग डेढ़ लाख विद्यार्थियों भाग लिया। गीत गायन, निबंध लेखन, चित्र कला, भाषण आदि प्रतियोगिताओं के कई चरण इस अंतर्गत हुए। 767 कार्यकत्ताओं ने इसमें अपनी सेवा दी। आज फाइनल राउंड के तहत गुरूदेव के सान्निध्य में 18 राज्यों से 350 विद्यार्थी प्रस्तुति देने पहुंचे।

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