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Home आराधना-साधना

धर्मयुक्त पथ पर चलने का हो प्रयास : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

अभातेयुप भारत की उभरती हुई संस्था हो रही है प्रतीत : शांतिदूत आचार्यश्री 

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October 11, 2025
in आराधना-साधना
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कोबा, गांधीनगर: कोबा के प्रेक्षा विश्व भारती वर्ष 2025 का चतुर्मास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में अहमदाबाद, गुजरात के ही नहीं, मानों पूरे भारत और विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचकर आध्यात्मिक ज्ञान की गंगा मंे गोते लगा रहे हैं। इतना ही नहीं देश के कई राजनेता, अभिनेता, चिकित्सक, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार आदि भी इस अध्यात्म की गंगा में गोते लगाने को पहुंच रहे हैं। शनिवार का दिन भी कुछ ऐसा ही रहा। शनिवार को प्रातःकाल आचार्यश्री जब भ्रमण पर थे, तभी अभिनेता व गोरखपुर के सांसद श्री रविकिशन उनकी सन्निधि में पहुंचे और मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। अहमदाबाद चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के कार्यालय में ही आचार्यश्री के साथ उनकी संक्षिप्त वार्तालाप भी हुई। तदुपरान्त आचार्यश्री पुनः प्रवास स्थल की ओर लौटे। प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को मंगल पाथेय प्रदान करने के साथ अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के वार्षिक अधिवेशन के संदर्भ में मंगल प्रेरणा प्रदान की। प्रवचन के उपरान्त दोपहर बाद आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में भारत सरकार की पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी पहुंची और आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। आज ही राजस्थान के युवा विधायक श्री रविन्द्रसिंह भाटी भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे और आचार्यश्री के दर्शन व मंगल आशीर्वाद से लाभान्वित हुए।
शनिवार को ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि इस दुनिया में दुःख भी है और प्राणियों को नाना प्रकार के दुःख और कष्ट आते रहते हैं। दुःख है तो दुःख के कारण भी हैं। दुःख से मुक्ति भी हो सकती है और दुःख मुक्ति के भी कारण हैं। प्रश्न हो सकत है कि दुःख क्या है? उत्तर दिया गया कि जो भी प्रतिकूल वेदन, संवेदन होता है, वह दुःख होता है। नव तत्त्व जैन दर्शन में बताए गए हैं- जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष। इनमें जो पाप है, इस पाप के उदय से प्राणी दुःख का अनुभव करता है। आठ कर्म भी बताए गए हैं, इनमें एकांत पापात्मक व चार उभयात्मक होते हैं। आठों ही कर्मों से पाप जुड़ा हुआ है। जीव मंें जो आश्रव रूप परिणाम से कर्मों का आकर्षण होता है, इसलिए आश्रव को भी दुःख का कारण कह सकते हैं। पाप और दुःख का कारण ही आश्रव है। जन्म-मरण, संसार आदि सभी का हेतु आश्रव को ही कहा गया है।
अब दुःखमुक्ति भी हो सकती है क्या? इस पर विचार किया जाए तो स्वल्प दुःखमुक्ति तो कभी भी हो सकती है, पूर्णतया दुःखमुक्ति कैसे जीव को प्राप्त हो? उसके एक लिए एक मात्र माध्यम है मोक्ष। जीव को जैसे ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, उसे किसी भी प्रकार का कोई दुःख नहीं होता। संवर मोक्ष प्राप्ति का एक बड़ा कारण बनता है। निर्जरा भी उसमें सहायक बनती है।
इस प्रकार संवर और निर्जरा की आराधना के द्वारा मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। दुनिया के प्रत्येक प्राणी को किसी न किसी प्रकार की समस्या, दुःख तकलीफ आती ही रहती है। आदमी के जीवन में भी कितनी-कितनी समस्याएं आती हैं। कभी सुगर की समस्या, किसी को किडनी की समस्या, किसी को लीवर की समस्या, किसी को श्वास की समस्या आदि-आदि समस्या हो सकती है। किसी के हाथ और पैर में कंपन हो जाती है। बीमारियां तो बड़े से बड़े सत्ताधीश आदि के शरीर में रोग पैदा हो जाता है और आदमी दुःख को प्राप्त होता है। जीवन में आधि, व्याधि और उपाधि के रूप में आती रहती हैं। शरीर में बीमारी आने पर आदमी सेवा, धर्म, ध्यान आदि कार्य भी करने मंे अक्षम होता है। इसलिए शास्त्र में कहा गया है कि जब तक बुढ़ापा पीड़ित न करे, बीमारी न लगे, और इन्द्रियां हीन न हो जाएं, तब तक आदमी को धर्म का समाचरण कर लेना चाहिए। आदमी को धर्म की आराधना करने, किसी दूसरे की सेवा करने में शक्ति का उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में कभी दुःख, कष्ट, कठिनाई आए तब भी आदमी को अपने मनोबल को मजबूत बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए, धर्मयुक्त पथ पर चलते रहने का प्रयास करना चाहिए। कार्यक्रम में समणी ज्योतिप्रज्ञाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के त्रिदिवसीय अधिवेशन का मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रमेश डागा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। महामंत्री श्री अमित नाहटा दो वर्ष के कार्यों का पूरा लेखाजोखा प्रस्तुत किया। तदुपरान्त अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के सदस्यों ने गायक श्री ऋषि दूगड़ के साथ अधिवेशन के गीत का संगान किया।
इस संदर्भ में शांतिदूत आचार्यश्री ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के अधिवेशन का अवसर है। तेरापंथ समाज में अनेक केन्द्रीय संस्थाएं हैं। उनमें युवाओं व किशारों की संस्था अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद है। युवक परिषद के इतिहास और पृष्ठभूमि पर आधारित प्रसंगों पर आधारित कोई सामग्री योगक्षेम वर्ष पर तैयार किया जा सकता है। अभातेयुप का कोई चिंतन शिविर लगे कि क्या नया उन्मेष लाया जा सके, ऐसा किया जा सकता है। अभातेयुप द्वारा कितने सारे कार्य किए जा रहे हैं। अभातेयुप भारत की एक उभरती हुई संस्था लग रही है। रास्ते की सेवा आदि का अच्छा कार्य हो रहा है। किशारों को सही राह चलाने का कार्य भी युवक परिषद को करने का प्रयास करना चाहिए। जिस रूप में अच्छा-धार्मिक कार्य होता रहे।
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