डेस्क:भारत में शॉर्ट-फॉर्म वीडियो का बाजार 2030 तक 8 से 12 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। टेक और डेटा आधारित परामर्श कंपनी रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स की रिपोर्ट से यह पता चलता है कि आज के समय में डिजिटल विज्ञापनों में शॉर्ट-फॉर्म वीडियो का हिस्सा 1% से भी कम है, लेकिन लोगों के कंटेंट देखने के कुल समय में इसका योगदान 7 से 10% तक है।
छोटे शहरों में बड़ी पकड़
भारत में ऐप यूजर्स का फैलाव पूरे देश के जनसंख्या के अनुरूप है। दुनिया के अन्य देशों में ऐसे ऐप्स के यूजर्स ज्यादातर बड़े शहरों (मेट्रो और टियर-वन) से आते हैं, जबकि भारत में 83% यूजर्स टियर-टू और उससे छोटे शहरों से हैं। इन शहरों में क्षेत्रीय भाषाओं वाली सामग्री सबसे अधिक पसंद की जाती है। गांवों में इसकी दीवानगी और अधिक है।
वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा
भारतीय SFV ऐप्स ने अपनाए जाने और यूजर जुड़ाव में लगातार वृद्धि की है। भारत के बड़े खिलाड़ी अब पैमाने और जुड़ाव के मामले में वैश्विक कंपनियों के बराबर पहुंच चुके हैं। भारत में औसत दैनिक सक्रिय यूजर ऐसे ऐप्स पर रोजाना 26 मिनट बिताता है, जो वैश्विक स्तर पर भी यही समय है।
दर्शकों की पसंद का कंटेंट
भारत में शॉर्ट-फॉर्म वीडियो की लाइब्रेरी को देश की जरूरतों के अनुसार बनाया गया है। यहां 51% यूजर्स संगीत और डांस से जुड़ी वीडियो सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
ब्रांड्स का रुख और फैशन की मांग
इन्फ्लुएंसर के माध्यम से ब्रांड विज्ञापनों का कन्वर्जन रेट ज्यादा है, और फैशन सबसे लोकप्रिय बेची जाने वाली श्रेणी है। जो ब्रांड पहले लंबे विज्ञापन बनाते थे, वे अब ज्यादातर अपने विज्ञापन खर्च इन्फ्लुएंसर्स पर कर रहे हैं क्योंकि इसका असर सीधे बिक्री पर दिखता है।
इन्फ्लुएंसर-एजेंसी मॉडल की कमजोरी
अभी ज्यादातर ब्रांड और इन्फ्लुएंसर के बीच विज्ञापन सौदे एजेंसियों के जरिए होते हैं। यह मॉडल अक्षम और कमजोर माना जा रहा है क्योंकि एजेंसियां अपनी सेवाओं के लिए भुगतान का बड़ा हिस्सा ले लेती हैं, जिससे इन्फ्लुएंसर को कम राशि मिलती है। इस कमी को दूर करने के लिए टेक-आधारित, पारदर्शी और बड़े पैमाने पर काम करने वाले क्रिएटर मार्केटप्लेस की जरूरत है, जो सीधे ब्रांड और क्रिएटर्स को जोड़ सके।













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