महाराष्ट्र की राजनीति ने इस सप्ताह वह दृश्य देखा, जो केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक संवेदनाओं की असली परीक्षा था। बीते सप्ताह तक राज्य के डिप्टी सीएम रहे अजित पवार अब इस दुनिया में नहीं हैं। बुधवार को हुए एक भीषण प्लेन क्रैश में उनकी आकस्मिक और दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु ने न केवल उनका परिवार, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति और लाखों समर्थकों को गहरे सदमे में डाल दिया।
अजित पवार केवल एक पद नहीं थे—वे एक धड़ा थे, एक सत्ता केंद्र थे। उनकी मौत के साथ ही एक स्वाभाविक सवाल उठ खड़ा हुआ—अब नेतृत्व कौन संभालेगा?
एनसीपी पहले से ही दो हिस्सों में बंटी हुई है और संख्या व सत्ता—दोनों लिहाज़ से बड़ा गुट अजित पवार के साथ था। ऐसे में सत्ता का खालीपन राजनीतिक अस्थिरता में न बदले, इसीलिए निर्णय तेज़ी से लिया गया।
और यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया।
सुनेत्रा पवार का निर्णय: शोक या ज़िम्मेदारी?
पति को श्रद्धांजलि देने के कुछ ही समय बाद सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम पद की शपथ ली। दृश्य भावुक था, वातावरण बोझिल था, लेकिन निर्णय स्पष्ट था—राज्य को अनिर्णय में नहीं छोड़ा जा सकता।
हालांकि, यही निर्णय कुछ लोगों को चुभ गया।
सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे—
“मातम के बीच शपथ?”
“क्या शोक के दिन सत्ता की जल्दबाज़ी ज़रूरी थी?”
कांग्रेस नेता उदित राज ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कम से कम मातम की अवधि में शपथ समारोह टाला जा सकता था। यह बयान आते ही राजनीतिक तापमान और चढ़ गया।
भाजपा का पलटवार: ‘चयनात्मक नैतिकता’ पर हमला
भाजपा ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया और आरोप लगाया कि यह “गिद्ध राजनीति” है—जहाँ शोक का इस्तेमाल केवल राजनीतिक अंक बटोरने के लिए किया जा रहा है। भाजपा नेताओं ने सवाल उठाया कि क्या सत्ता की ज़िम्मेदारी निभाना अपराध है? क्या संकट के समय निर्णय लेना असंवेदनशीलता कहलाएगा?
और यहीं से बहस ने इतिहास का दरवाज़ा खटखटाया।
राजीव गांधी का उदाहरण और असहज सच
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हुई, जिसने बहस की दिशा ही बदल दी—
“31 अक्टूबर 1984 को सुबह 9:20 बजे इंदिरा गांधी को गोली मारी गई।
दोपहर 2 बजे उन्हें मृत घोषित किया गया।
और उसी दिन शाम 6 बजे राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।”
भाजपा प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने इसी तथ्य को आधार बनाकर कांग्रेस से सवाल किया—
“आज जो लोग हिंदू परंपरा की दुहाई दे रहे हैं, वे तब कहां थे? क्या उस दिन परंपराएं याद नहीं आईं?”
तथ्य क्या कहते हैं?
पड़ताल करने पर यह बात तथ्यात्मक रूप से सही पाई गई कि राजीव गांधी ने इंदिरा गांधी की मृत्यु के उसी दिन प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उस समय इसे राष्ट्रीय संकट में त्वरित निर्णय के रूप में देखा गया—न कि संवेदनहीनता के रूप में।
तो सवाल उठता है—
क्या परंपराएं सत्ता के हिसाब से बदलती हैं?
अगर 1984 में शपथ कर्तव्य थी,
तो 2026 में वही शपथ असंवेदनशीलता कैसे हो गई?
अगर तब राष्ट्रहित था,
तो आज राज्यहित क्यों नहीं?
असल मुद्दा क्या है?
असल मुद्दा शपथ नहीं है।
असल मुद्दा है कौन शपथ ले रहा है।
राजनीति में शोक भी तभी स्वीकार्य होता है, जब वह हमारे पक्ष में हो। वरना वही शोक—हमला बन जाता है, ट्रोलिंग बन जाता है, और नैतिक उपदेशों का हथियार बन जाता है।
सुनेत्रा पवार का शपथ लेना किसी उत्सव का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक असहज, कठिन और जिम्मेदारी भरा निर्णय था—जिसे भावनाओं से ज़्यादा शासन की ज़रूरतों ने तय किया।
और शायद यही राजनीति की सबसे कड़वी सच्चाई है—
यहाँ आँसू भी पूछकर बहाने पड़ते हैं।













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