डेस्क : मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किशोर उम्र के लड़के-लड़कियों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों को अपराध मानने के मामलों में अक्सर केवल युवा लड़कों को ही गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। जस्टिस एन. माला ने एक पॉक्सो मामले में दोषी ठहराए गए युवक की सजा रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले अक्सर माता-पिता के विरोध के चलते दर्ज कराए जाते हैं।
क्या बोली अदालत
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने कहा कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्तों में अक्सर केवल लड़के को ही सजा भुगतनी पड़ती है। कई बार माता-पिता के दबाव में लड़की को किसी और से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसके बाद लड़के के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत आपराधिक कार्रवाई शुरू कर दी जाती है।
यह फैसला ‘महेश’ नामक युवक की आपराधिक अपील पर सुनाया गया। पहले नागरकोइल की पॉक्सो अदालत ने 23 जून 2025 को महेश को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(l)/6 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने महेश को पॉक्सो अपराध के लिए 20 साल और अपहरण के लिए 5 साल का कठोर कारावास सुनाया था, दोनों सजाएं साथ चलनी थीं।
मामले का विवरण
सरकारी वकीलों के अनुसार, मार्च 2018 में पीड़िता की उम्र लगभग 16 वर्ष थी। वह महेश को जानती थी, जो उसके बड़े भाई का मित्र था। महेश ने फोन पर शादी का प्रस्ताव रखा और पीड़िता ने बताया कि उसके माता-पिता उसकी मर्जी के खिलाफ किसी और से शादी तय कर रहे हैं। 4 मार्च 2018 को पीड़िता महेश के साथ अपने घर से चली गई और चाचा के घर जाकर शादी कर ली। 5 अप्रैल तक दोनों पति-पत्नी की तरह रहे। इसके बाद किसी ने चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर गुमनाम कॉल की, जिसके बाद जिला बाल संरक्षण इकाई ने उन्हें पकड़कर महिला पुलिस स्टेशन को सौंपा।
अदालत ने क्यों किया बरी
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में बुनियादी खामी पाई। पॉक्सो एक्ट लागू करने के लिए पीड़िता की उम्र साबित करना आवश्यक है। पुलिस ने केवल जन्म प्रमाण पत्र और ट्रांसफर सर्टिफिकेट की फोटोकॉपी पेश की, जबकि मूल दस्तावेज उपलब्ध थे। अदालत ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत केवल मूल दस्तावेज (प्राथमिक साक्ष्य) ही स्वीकार्य हैं। इस खामी के कारण हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर आरोपी महेश को सभी आरोपों से बरी कर जेल से रिहा करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट के ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ का हवाला
हाईकोर्ट ने इसे एक ‘टिपिकल केस’ बताया, जिसमें आपसी सहमति से बने किशोर प्रेम प्रसंग माता-पिता के विरोध के चलते दुखद मोड़ पर समाप्त हुए। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुधा (2026) का हवाला दिया, जिसमें पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए किशोर प्रेम संबंधों के लिए रोमियो-जूलियट क्लॉज लागू करने पर सुझाव दिया गया।
सरकार को निर्देश
हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव को निर्देश दिए कि वे पॉक्सो एक्ट की धारा 43 के तहत कानून के प्रति जन जागरूकता सुनिश्चित करें। अदालत ने कहा कि सरकारी और निजी स्कूलों एवं कॉलेजों में जागरूकता शिविर आयोजित कर छात्रों और माता-पिता को कानून के गंभीर परिणामों से अवगत कराना जरूरी है। मुख्य सचिव को इस संबंध में 3 जून 2026 तक स्थिति रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया है।













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