डेस्क : भारत के इस्पात उद्योग में आने वाले पाँच वर्षों में मजबूत वृद्धि की संभावना जताई गई है, जिससे रैमिंग मास जैसे प्रमुख औद्योगिक उपभोग उत्पादों की मांग में निरंतर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। यह आकलन चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक हालिया रिपोर्ट में सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कच्चा इस्पात उत्पादन वित्त वर्ष २०२६ में १६८.४ मिलियन टन से बढ़कर वित्त वर्ष २०३१ तक लगभग २५५ मिलियन टन तक पहुँच सकता है। इस वृद्धि में इंडक्शन भट्ठी मार्ग की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहने की संभावना है। अनुमान है कि इंडक्शन भट्ठियों के माध्यम से उत्पादन ४५.८ मिलियन टन से बढ़कर ६९.४ मिलियन टन तक पहुँच सकता है।
इंडक्शन भट्ठियों में लाइनिंग के रूप में उपयोग होने वाला रैमिंग मास इस विस्तार के साथ सीधे तौर पर लाभान्वित होगा। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि जहाँ इस्पात निर्माता कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होते हैं, वहीं रिफ्रैक्टरी सामग्री आपूर्तिकर्ताओं के लिए यह व्यवसाय अधिकतर दोहराव आधारित और मात्रा-संचालित होता है, जिससे आय में स्थिरता बनी रहती है।
चॉइस इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने इस क्षेत्र में तीन प्रमुख रुझानों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इनमें असंगठित बाजार का धीरे-धीरे संगठित रूप लेना, भट्टियों के अधिक उपयोग के कारण रिफ्रैक्टरी खपत में वृद्धि, तथा पूर्वी भारत के इस्पात उत्पादन केंद्रों के निकट स्थित निर्माताओं को मिलने वाला लॉजिस्टिक लाभ शामिल है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी वैश्विक चुनौतियाँ तथा बिजली एवं शीतलन संबंधी सीमाएँ इस्पात उत्पादकों को भट्ठी दक्षता बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही हैं, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले रिफ्रैक्टरी उत्पादों की आवश्यकता और अधिक बढ़ रही है।
चॉइस ने मोनोलिथ कंपनी पर कवरेज शुरू करते हुए कहा है कि पूर्वी भारत में इसकी विनिर्माण इकाई इसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में मजबूत लॉजिस्टिक लाभ प्रदान करती है, जो प्रति टन लगभग ८०० से १२०० रुपये तक हो सकता है।
कंपनी की योजना अपनी स्थापित क्षमता को वित्त वर्ष २०२७ की शुरुआत तक २,१०,००० मीट्रिक टन प्रति वर्ष से बढ़ाकर ५,७५,००० मीट्रिक टन प्रति वर्ष करने की है। अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष २०२६ में बिक्री १,७१,२०० मीट्रिक टन से बढ़कर वित्त वर्ष २०२९ तक लगभग ४,८७,३०० मीट्रिक टन तक पहुँच सकती है। इसी अवधि में कंपनी का राजस्व १,३५३ मिलियन रुपये से बढ़कर ४,५३२ मिलियन रुपये तक जाने का अनुमान है।
हालाँकि रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि परियोजना क्रियान्वयन में देरी, ग्राहकों पर अत्यधिक निर्भरता तथा कार्यशील पूंजी पर दबाव जैसे जोखिम बने रह सकते हैं। इसके बावजूद एनएसई मुख्य बोर्ड में संभावित स्थानांतरण और बैकवर्ड इंटीग्रेशन जैसे कारक आगे चलकर अतिरिक्त मजबूती प्रदान कर सकते हैं।













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