लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी लाडनूं में बना जैन विश्व भारती संस्थान का परिसर वर्तमान समय में तीर्थस्थली बनी हुई है। जहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा समर्पित करने, दर्शन करने व उपासना करके आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति की कामना से पहुंच रहे हैं। जी हां, योगक्षेम वर्ष के महामंगल प्रवास हेतु जब से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर में विराजे हैं, तेरापंथ की राजधानी मानों तीर्थ स्थली के रूप में परिवर्तित हो गई है। देश-विदेश में रहने वाले श्रद्धालु प्रतिदिन बड़ी संख्या में पहुंचकर अपने आराध्य के दर्शन, सेवा, उपासना व अमृतमय प्रवचन के श्रवण का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इतना ही नहीं, आचार्यश्री के साथ सैंकड़ों की संख्या में उपस्थित साधु-साध्वियों के एक साथ दर्शन का सुअवसर भी श्रद्धालुओं को यहां मानों खींच कर ला रहा है। नित्य प्रति सुधर्मा सभा में आयोजित होने वाले प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में साधु-साध्वी, समणश्रेणी, श्रावक-श्राविकाओं के साथ-साथ अन्य लोग भी उपस्थित होते हैं। जहां उन्हें आचार्यश्री की अमृतमयी वाणी से पावन पाथेय प्राप्त होता है।
बुधवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘पूज्यप्रवर के साथ कैसा व्यवहार?’ पर पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आचार्य, उपाध्याय जैन शासन में महत्त्वपूर्ण चारित्रात्माएं होती हैं। तीर्थंकरों की अनुपस्थिति में आचार्य पद पर अवस्थित व्यक्ति का भी अपना महत्त्व होता है। आगम में अनेक स्थान पर आचार्य-उपाध्याय दोनों नाम एक साथ आते हैं। एक ही चारित्रात्मा दोनों पद का दायित्व भी संभाल सकते हैं। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में तो अलग से कोई उपाध्याय पद पर मनोनीत ही नहीं है। हमारे यहां आचार्य पद में ही उपाध्याय पद भी विलीन है। उपाध्याय का दायित्व भी मानों उनमें ही समाहित है। महामना आचार्यश्री भिक्षु ने फरमाया था कि सातों पदों का दायित्व मैं ही संभालता हूं। मानों उनकी वाणी आज तक पूर्णरूपेण पालित होती आ रही है। तेरापंथ धर्मसंघ में केवल ज्ञान ही नहीं, व्यवस्थागत जिम्मेदारी भी आचार्य में ही सन्निहित होती है।
आचार्य के संदर्भ में बताया गया है कि आचार्य को गण की चिंता से मुक्त होना चाहिए। उन्हें अपना ज्यादा समय ज्ञान ग्रहण करने और फिर उस ज्ञान को दूसरों में प्रसारित करने में लगाना चाहिए। हमारे धर्मसंघ की दृष्टि से आचार्य पद की जिम्मेदारी बहुत बेजोड़ है। हां आचार्य कुछ व्यवस्था की जिम्मेदारी युवाचार्य को सौंप कर मानों कुछ हल्का हो सकते हैं। आचार्य-उपाध्याय ज्ञान और आचार प्रदान करते हैं। यह भी उपकार का कार्य होता है। आचार्य-उपाध्याय जो ज्ञान और संस्कार प्रदान करते हैं, उनकी बुराई करना, निंदा, अवज्ञा, अवहेलना करने वाला पाप श्रमण कहलाता है। उपकारी की अवज्ञा करने वाला आदमी बहुत हल्का होता है। जो सज्जन होता है, जो साधु होता है, वह किसी द्वारा किया गया उपकार भूलता नहीं है। इसलिए ऐसी प्रेरणा लेनी चाहिए कि अपने गुरु, आचार्य, उपाध्याय, माता-पिता की सेवा, सहयोग, विनय रखना बहुत अच्छी बात हो सकती है। साधु-साध्वियों को तो सद्गुण सम्पन्न होना चाहिए और अवज्ञा, अवहेलना के भाव से बचने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासओं के उत्तर प्रदान किए। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अनुयोगदारायम की अंग्रेजी में अनुवादित पुस्तक लोकार्पित की गई। इस संदर्भ में डॉ. अनुपम जैन ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ मंे मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस दौरान आचार्यश्री ने डॉ. जैन द्वारा लिखित जैन गणित के संदर्भ में भी मंगल प्रेरणा प्रदान की। तदुपरान्त सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को अपने आराध्य के समक्ष अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ।













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