जयपुर : निर्माण नगर स्थित महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल के संबोधि सभागार में सोमवार को आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री तत्त्वरुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मानव जीवन में शांति की स्थापना करना है। ‘‘धर्म और शांति’’ विषय पर प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि अतीत के सभी महापुरुषों की साधना का मूल आधार शांति रहा है और भविष्य में भी धर्म-साधना का परम लक्ष्य शांति ही रहेगा।
मुनि श्री ने भगवान महावीर के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति के जीवन में धार्मिक साधना के बावजूद शांति का अभाव है, तो उसे अपनी धार्मिक क्रियाओं का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार दवा लेने के बाद भी रोग दूर न हो, भोजन करने के बाद भूख न मिटे अथवा पानी पीने के बाद प्यास न बुझे, तो उन क्रियाओं की सार्थकता पर प्रश्न उठता है। उसी प्रकार धर्म-ध्यान का परिणाम जीवन में शांति और सकारात्मक परिवर्तन के रूप में दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धैर्य, सहनशीलता, संयम और समभाव धार्मिक व्यक्ति की पहचान हैं। जीवन की कठिन परिस्थितियों में मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण सूत्र स्मरण रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि “यह भी बीत जाएगा” जैसे विचार व्यक्ति को संकट के समय धैर्य और संतुलन प्रदान करते हैं।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने कहा कि धर्म और शांति का संबंध अविभाज्य है। जिस प्रकार धुआँ आग की उपस्थिति का संकेत देता है, उसी प्रकार सरल, निश्छल और शांत व्यवहार किसी व्यक्ति के धार्मिक होने का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि सच्चे धार्मिक व्यक्ति को अपने धर्म का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं होती, उसके आचरण और व्यवहार से ही उसकी पहचान हो जाती है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर भगवान अरिष्टनेमि प्रभु की स्तुति के साथ हुआ। अंत में त्याग-प्रत्याख्यान के साथ धर्मसभा का समापन किया गया।













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