स्पोर्ट्स डेस्क : भारतीय क्रिकेट के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने कहा है कि क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में सफल होने के लिए बल्लेबाजों को अपनी बैकलिफ्ट और शॉट खेलने की तकनीक को परिस्थितियों तथा प्रारूप की मांग के अनुरूप ढालना होगा। उनका मानना है कि खेल लगातार बदल रहा है और खिलाड़ियों को इस बदलाव को स्वीकार करना चाहिए।
क्रिकइन्फो ऑनर्स अवॉर्ड्स 2026 में पिछले 25 वर्षों के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों की सूची में दूसरे स्थान पर रहे सचिन ने कहा कि किसी भी बल्लेबाज के लिए विभिन्न प्रारूपों में खुद को ढालने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसकी बैकलिफ्ट है। उन्होंने कहा कि यदि कोई बल्लेबाज अपने बल्ले के डाउनस्विंग को नियंत्रित करना सीख ले, तो वह क्रिकेट के सभी प्रारूपों में सफलता प्राप्त कर सकता है।
सचिन ने कहा, “टी-20 क्रिकेट आक्रामकता की मांग करता है, एकदिवसीय क्रिकेट दोनों के बीच का प्रारूप है, जबकि टेस्ट क्रिकेट खिलाड़ी की कई तरह से परीक्षा लेता है। ऐसे में परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण है। मैं हमेशा उस अच्छे खिलाड़ी को अधिक खतरनाक मानता हूं जो परिस्थितियों का सम्मान करते हुए बल्लेबाजी करता है, बजाय उस बेहद प्रतिभाशाली खिलाड़ी के जो केवल अपनी शैली में ही खेलना चाहता है।”
पूर्व भारतीय कप्तान ने कहा कि टेस्ट क्रिकेट में बल्लेबाज को गेंद को सही तरीके से बचाव करना आना चाहिए। यदि कोई खिलाड़ी गुणवत्तापूर्ण तेज गेंदबाजी के खिलाफ फ्रंट फुट पर मजबूती से रक्षा कर सकता है, तो वह किसी भी स्तर पर सफल हो सकता है।
सचिन ने 2011 में भारत की विश्व कप जीत को याद करते हुए कहा कि उस अभियान के दौरान पूरी टीम का ध्यान दबाव को सही दिशा में मोड़ने पर था। उन्होंने बताया कि देशभर में यात्रा के दौरान लोगों की अपेक्षाएं बहुत अधिक थीं, लेकिन टीम को लगातार यह समझाया जाता था कि विश्व कप जीतने की इच्छा तो हो, लेकिन दबाव और तनाव को खुद पर हावी न होने दिया जाए।
उन्होंने कहा, “हम लगातार इस बात पर चर्चा करते थे कि दबाव को कैसे सकारात्मक ऊर्जा में बदला जाए। यदि दबाव आपके कंधों पर बोझ बन जाए तो वह आपको नीचे खींचता है, लेकिन यदि करोड़ों लोग आपके साथ एक ही दिशा में आगे बढ़ रहे हों, तो बहुत कम टीमें आपको रोक सकती हैं।”
गौरतलब है कि 2011 विश्व कप में सचिन तेंदुलकर ने नौ पारियों में 482 रन बनाए थे। उन्होंने दो शतक और दो अर्धशतक लगाए तथा 53.55 की औसत से रन बनाते हुए भारत की खिताबी जीत में अहम भूमिका निभाई थी। वह उस टूर्नामेंट में सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाजों की सूची में दूसरे स्थान पर रहे थे।













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