डेस्क : भारत और पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतों को लेकर इस समय बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिल रही है। जहां भारत में हाल के सप्ताहों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हुई है, वहीं पाकिस्तान सरकार लगातार पांचवीं बार ईंधन की कीमतों में कटौती कर चुकी है।
विशेषज्ञों के अनुसार दोनों देशों की परिस्थितियां और ईंधन मूल्य निर्धारण की नीतियां अलग-अलग होने के कारण यह अंतर दिखाई दे रहा है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है और हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े आपूर्ति संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया। इसका असर भारतीय तेल विपणन कंपनियों की लागत पर पड़ा और उन्हें चरणबद्ध तरीके से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़े।
मई महीने के दौरान भारतीय तेल कंपनियों ने कई चरणों में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए। सरकारी तेल कंपनियों का कहना था कि बढ़ती लागत और लगातार हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए मूल्य वृद्धि आवश्यक हो गई थी।
दूसरी ओर पाकिस्तान में सरकार ने करों और लेवी में बदलाव के जरिए उपभोक्ताओं को राहत देने का प्रयास किया है। वहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाल में आई नरमी और सरकारी नीतिगत फैसलों के चलते पेट्रोल की कीमतों में लगातार कटौती की गई है। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान में ईंधन मूल्य निर्धारण पर सरकारी हस्तक्षेप भारत की तुलना में अधिक है, जिससे वहां अल्पकालिक राहत देना संभव हो पाता है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि भारत में ईंधन की कीमतें केवल कच्चे तेल के दामों से तय नहीं होतीं। इसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क, राज्य सरकारों का वैट, परिवहन लागत और विपणन मार्जिन भी शामिल होते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का प्रभाव घरेलू कीमतों पर तुरंत और समान रूप से दिखाई नहीं देता।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता बनी रहती है और भू-राजनीतिक तनाव कम होता है तो आने वाले समय में भारतीय उपभोक्ताओं को भी राहत मिलने की संभावना बन सकती है। फिलहाल तेल कंपनियां वैश्विक बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।













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