सूडान से आ रही खबरें केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि मानवता के क्षरण की भयावह गाथा हैं। वर्ष 2026 के पहले पाँच महीनों में ही ड्रोन हमलों में एक हजार से अधिक नागरिकों की मृत्यु हो चुकी है। संघर्ष शुरू होने के बाद से हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लाखों अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं और तीन करोड़ चालीस लाख से अधिक लोग मानवीय सहायता पर निर्भर हैं। इन संख्याओं के पीछे असंख्य टूटे हुए परिवार, उजड़े हुए गांव और बिखरे हुए सपने छिपे हैं।
लेकिन इस त्रासदी का सबसे दुखद पक्ष केवल हिंसा नहीं, बल्कि उस हिंसा के प्रति विश्व समुदाय की बढ़ती उदासीनता है।
अप्रैल 2023 में जब सूडानी सशस्त्र बलों और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज़ के बीच संघर्ष आरंभ हुआ था, तब उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव दोनों पक्षों को वार्ता की मेज तक लाएगा। किंतु समय के साथ यह संघर्ष सत्ता के लिए ऐसी निर्मम लड़ाई में बदल गया है, जिसमें आम नागरिक सबसे आसान शिकार बन गए हैं। युद्ध का दायरा बढ़ा है, हथियार अधिक घातक हुए हैं और मानवीय पीड़ा असहनीय स्तर तक पहुँच गई है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त वोल्कर टुर्क की चेतावनी विशेष रूप से चिंताजनक है। ड्रोन युद्ध का तेजी से बढ़ता प्रयोग आधुनिक तकनीक के उस अंधेरे पक्ष को उजागर करता है, जहां जवाबदेही के अभाव में तकनीक विनाश का उपकरण बन जाती है। अस्पताल, विद्यालय, बाजार, ईंधन भंडार और विस्थापितों के शिविर—जो कभी सुरक्षा और आश्रय के प्रतीक माने जाते थे—अब हमलों के निशाने बन रहे हैं।
एल-ओबैद में कब्रिस्तान और ईंधन स्टेशन के निकट हुए ड्रोन हमले में कम से कम 15 लोगों की मृत्यु इस बात का प्रमाण है कि युद्ध अब सैनिकों तक सीमित नहीं रहा। नागरिक जीवन और सैन्य लक्ष्य के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। यदि किसी संघर्ष में बच्चों, महिलाओं, रोगियों और शरणार्थियों के लिए भी कोई सुरक्षित स्थान न बचे, तो वह केवल युद्ध नहीं रह जाता; वह सभ्यता की विफलता बन जाता है।
स्थिति को और भयावह बनाती हैं यौन हिंसा, जबरन विस्थापन और मानवाधिकार उल्लंघनों की बढ़ती घटनाएं। इतिहास गवाह है कि जब किसी युद्ध में जवाबदेही समाप्त हो जाती है, तब अत्याचार सामान्य घटना बन जाते हैं। सूडान आज उसी खतरनाक दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है।
दुर्भाग्य से अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इस संकट की गंभीरता के अनुरूप नहीं है। यूरोप और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने वैश्विक विमर्श पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि सूडान की त्रासदी धीरे-धीरे सुर्खियों से गायब होती जा रही है। मानवीय सहायता एजेंसियां संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं, शांति प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं और कूटनीतिक पहलें प्रभावहीन साबित हो रही हैं।
यह भूलना खतरनाक होगा कि किसी भी मानवीय संकट के प्रभाव सीमाओं के भीतर सीमित नहीं रहते। लंबे समय तक जारी अस्थिरता पूरे क्षेत्र को असुरक्षित बना सकती है, शरणार्थी संकट को गहरा सकती है, खाद्य असुरक्षा बढ़ा सकती है और कट्टरपंथी तत्वों को पनपने का अवसर दे सकती है।
आज आवश्यकता केवल चिंता व्यक्त करने की नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई की है। युद्ध अपराधों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, मानवीय सहायता के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किए जाने चाहिए, और संघर्षरत पक्षों पर अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने के लिए वास्तविक दबाव बनाया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
सूडान आज हमारे समय की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक का प्रतीक बन चुका है। ड्रोन हमलों में बढ़ती मौतें, लगातार होते अत्याचार और विस्थापन की भयावहता इस बात का संकेत हैं कि स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है।
दुनिया यह नहीं कह सकती कि उसे पता नहीं था। चेतावनियां दी जा चुकी हैं। तथ्य सामने हैं। प्रश्न केवल इतना है कि क्या विश्व समुदाय तब जागेगा जब अभी भी कुछ बचाया जा सकता है, या फिर वह तब प्रतिक्रिया देगा जब बहुत देर हो चुकी होगी।
क्योंकि ऐसे समय में मौन केवल निष्क्रियता नहीं होता। इतिहास की अदालत में वह भी अपराध की श्रेणी में खड़ा दिखाई देता है।













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