डेस्क : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बावजूद भारत में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दामों में कोई बड़ी कटौती नहीं की गई है। इससे आम उपभोक्ताओं में सवाल उठने लगे हैं कि जब कच्चा तेल सस्ता हो रहा है, तो इसका लाभ सीधे जनता तक क्यों नहीं पहुंच रहा।
रिपोर्टों के अनुसार हाल के हफ्तों में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है, जिससे ईंधन की लागत कम होने की उम्मीद थी। इसके बावजूद सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने घरेलू बाजार में कीमतों में तुरंत कोई बदलाव नहीं किया है।
सरकार की ओर से दिए गए संकेतों में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट का असर घरेलू बाजार तक तुरंत नहीं पहुंचता, क्योंकि कच्चे तेल की खरीद पहले से तय अनुबंधों और आयात प्रक्रिया के तहत होती है। इसके अलावा परिवहन, शोधन (रिफाइनिंग) और भंडारण लागत भी अंतिम कीमत को प्रभावित करती है।
ऊर्जा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार हाल ही में कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल जब रिफाइनरियों तक पहुंचेगा, तभी उसका प्रभाव पेट्रोल और डीजल की कीमतों में दिख सकता है। इसी कारण फिलहाल खुदरा कीमतों में कोई तत्काल कटौती नहीं की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में ईंधन की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल पर ही निर्भर नहीं करतीं, बल्कि कर संरचना का बड़ा हिस्सा भी इसमें शामिल होता है। केंद्र और राज्य सरकारों के कर (एक्साइज ड्यूटी और वैट) मिलकर पेट्रोल-डीजल की कीमत का लगभग आधा हिस्सा बनाते हैं।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव और कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद कीमतें स्थिर रहने से विपक्ष और उपभोक्ता समूह सरकार से पारदर्शिता और तत्काल राहत की मांग कर रहे हैं। वहीं तेल कंपनियों का कहना है कि बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए कीमतों में बदलाव धीरे-धीरे किया जाता है।
इसी बीच विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले समय में यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं, तो घरेलू ईंधन दरों में कटौती की संभावना बन सकती है।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत