डेस्क : संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथनेनी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की एरिया-फॉर्मूला बैठक में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय-6 के अंतर्गत बनी पुरानी मध्यस्थता व्यवस्थाओं की समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान द्वारा की गई टिप्पणियों को मंच के राजनीतिक दुरुपयोग का प्रयास बताया।
“यूएनएससी प्रस्तावों के क्रियान्वयन और अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की रक्षा के बीच की खाई को पाटना” विषय पर आयोजित बैठक में भारत की ओर से वक्तव्य देते हुए पर्वथनेनी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय-6 और अध्याय-7 की प्रकृति तथा उपयोगिता एक-दूसरे से भिन्न है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अध्याय-7 उन परिस्थितियों के लिए बनाया गया है, जहां शांति के लिए प्रत्यक्ष खतरा, शांति का उल्लंघन या आक्रामकता जैसी स्थितियां उत्पन्न हों और शांति बहाली के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता हो। उन्होंने कहा कि ऐसे उपायों के अनुपालन में विफलता से स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती है तथा यह बहुपक्षवाद और अंतरराष्ट्रीय कानून की मूल भावना के विपरीत है।
अध्याय-6 का उल्लेख करते हुए भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि यह उन परिस्थितियों के समाधान के लिए विभिन्न विकल्प उपलब्ध कराता है, जिनके बने रहने से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है। इनमें वार्ता, जांच, मध्यस्थता, सुलह, पंचाट और अन्य शांतिपूर्ण उपाय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे हस्तक्षेप तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं और उनकी वैधता अनंतकाल तक नहीं मानी जा सकती।
पर्वथनेनी ने कहा कि समय और परिस्थितियों के बदलने के साथ इन व्यवस्थाओं की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। उन्होंने फिलिस्तीन मुद्दे का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां संघर्ष की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप मध्यस्थता ढांचे लगातार विकसित होते रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मान लेना कि अध्याय-6 के तहत किसी मध्यस्थता व्यवस्था की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी, एक गलत धारणा है।
भारत ने यह भी तर्क दिया कि जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के विभिन्न जनादेशों की समीक्षा “यूएन-80” ढांचे के तहत की जा रही है, तो सुरक्षा परिषद के जनादेशों को भी इस प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
बैठक के दौरान पाकिस्तान के प्रतिनिधि द्वारा की गई टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए पर्वथनेनी ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि एक सह-अध्यक्ष, जिससे निष्पक्षता और संतुलन की अपेक्षा की जाती है, उसने इस मंच का राजनीतिकरण करने का प्रयास किया है।
जम्मू-कश्मीर पर भारत का रुख दोहराते हुए उन्होंने कहा कि “जम्मू-कश्मीर का केंद्रशासित प्रदेश भारत का आंतरिक विषय है। यह पहले भी भारत का अभिन्न हिस्सा था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा।”
गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अध्याय-6 विवादों के शांतिपूर्ण समाधान से संबंधित है, जबकि अध्याय-7 शांति के लिए खतरों, शांति भंग होने और आक्रामक कार्रवाइयों से निपटने के उपायों का प्रावधान करता है।













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