जयपुर : मानसरोवर स्थित इस्कॉन रोड के अमृत नगर में बुधवार को आयोजित प्रवचन सभा में “हिंसा – अहिंसा का विवेक” विषय पर उद्बोधन देते हुए मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने कहा कि हिंसा कभी भी अहिंसा नहीं हो सकती। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति हिंसा करता है, वह पाप का भागी होता है, किंतु उससे भी अधिक दोषी वह होता है जो हिंसा को धर्म का आवरण पहनाकर उसे उचित ठहराता है, क्योंकि उसके कारण अनेक लोग धर्म समझकर पाप कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं।
मुनि श्री ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज कुछ लोग अहिंसा के नाम पर भी हिंसा को धर्म की स्थापना बताने का प्रयास करते हैं, जो जिनवाणी के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग स्वयं तो उन कर्मों से दूर रहना चाहते हैं, किंतु अपने अनुयायियों को उसे धर्म बताकर प्रेरित करते हैं, जो आध्यात्मिक दृष्टि से गंभीर भ्रम उत्पन्न करता है।
उन्होंने भगवान महावीर के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस कार्य को कराने में धर्म है, उसी को करने और उसका समर्थन करने में भी धर्म होता है, परंतु जिस कार्य में धर्म नहीं है, उसमें किसी भी प्रकार से—ना करने में, ना कराने में और ना अनुमोदन में—धर्म संभव नहीं है।
मुनि श्री ने कहा कि धर्म में किसी प्रकार का विरोधाभास स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे मिश्री का सेवन करने पर हर व्यक्ति को मिठास ही प्राप्त होती है, वैसे ही जहाँ धर्म है, वहाँ उसका आचरण करने पर धर्म का ही फल प्राप्त होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह विचारणीय है कि क्या कुछ लोग अपने लिए किसी कार्य को धर्म और दूसरों के लिए वही कार्य अधर्म बताकर दोहरी दृष्टि नहीं अपना रहे हैं।
कार्यक्रम में उपस्थित मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हिंसा कभी अहिंसा नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि हिंसा, किसी भी दृष्टिकोण से देखी जाए, वह हिंसा ही रहती है और उसमें धर्म की स्थापना का विचार मिथ्या दृष्टिकोण है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि गृहस्थ जीवन में पूर्ण रूप से हिंसा से मुक्त होना कठिन है, किंतु कर्तव्य पालन के लिए की गई हिंसा भी हिंसा ही है। उन्होंने सम्यक दृष्टि को परिभाषित करते हुए कहा कि हिंसा को हिंसा और अहिंसा को अहिंसा के रूप में स्वीकार करना ही सही दृष्टिकोण है।
प्रवचन के प्रारंभ में तीर्थंकर पद्म प्रभु की स्तुति का संगान किया गया। मुनि श्री ने तीर्थंकर स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया कि तीर्थंकर बनने वाले जीव अपने अंतिम भव में नरक या देवगति से आते हैं। जन्म से पूर्व वे तीन ज्ञानों से युक्त होते हैं और जन्म के बाद दीक्षा के समय सहज रूप से चौथा ज्ञान प्राप्त करते हैं। कठोर साधना द्वारा चार घाती कर्मों का क्षय कर वे केवलज्ञान को प्राप्त करते हैं।
कार्यक्रम का समापन एक दिवसीय त्याग-प्रत्याख्यान एवं मंगलपाठ के साथ हुआ।













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