लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को शुक्रवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आज के निर्धारित विषय ‘नागराज की तरह अव्यथित रहें’ से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि बाईस परिषह बताए गए हैं। कर्म निर्जरा के लिए ये परिषह यदा-कदा साधु के सामने आते रहते हैं, अनेक परिषह की स्थिति आ सकती है।
परिषह आने पर दो प्रकार की स्थितियां बनती हैं। पहली वह स्थिति जिसमें कायर पुरुष परिस्थितियों के आने से खिन्न हो जाते हैं। हार मान लेना कायरता होती है। हाथी युद्ध में भी विचलित नहीं होता, उसी प्रकार साधु को हाथी की तरह अथवा नागराज की तरह अव्यथित रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु को तो परिषहों को शांति से सहन करने का प्रयास करना चाहिए। साधु की तो परिभाषा यही होती है कि जो शांत होता है, वह संत होता है। वह अहंकार, आक्रोश में न जाए। वह नागराज और हाथी की तरह अविचलित रहे।
कभी भूख का परिषह हो जाए तो कभी रात्रि में प्यास लग जाए तो कोई जप या प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। मच्छर भी काटे तो भी उसके प्रति मन में द्वेष नहीं करना चाहिए और गुस्से में वार भी नहीं करना चाहिए। मौके पर नहीं बोलना भी बहुत बड़ी साधना है। साधु को अनावश्यक बोलने से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। कभी समय मिले तो रात्रि शयन से पहले आत्मावलोकन करने का प्रयास करना चाहिए।
जो बात शांति से कही जा सकती है, उस बात को गुस्से में क्यों कहना। आज आ गया तो आगे से इस बात पर ध्यान देना चाहिए। आहार आदि में कभी असंयम तो नहीं हुआ न। यदि ध्यान में आया तो आगे से यह ध्यान रहे कि अस्वाद की साधना करने का प्रयास होना चाहिए। अनेक रूपों में आत्मावलोकन करना चाहिए। कोई गलती हो जाए तो उसकी शुद्धि का भी प्रयास करना चाहिए।
प्रतिदिन सूर्यादय होता है और सूर्यास्त होता है तो यह विचार रखना चाहिए कि रोज सूर्य जीवन एक हिस्सा लेकर चला जाता है। इसलिए यह ध्यान देना चाहिए कि कोई अच्छा कार्य, कोई जप, कोई तप आदि हुआ या नहीं, इसका विचार कर अच्छे कार्य, जप, तप और ध्यान आदि करने का प्रयास करना चाहिए। योगक्षेम वर्ष चल रहा है, कहीं विहार नहीं होना तो जितना संभव हो सके, प्रतिदिन नवकारसी की तपस्या कर लेने का प्रयास होना चाहिए। शरीर की अनुकूलता हो तो नवकारसी की जा सकती है। किसी सेवा सापेक्ष की सेवा करना भी अच्छी बात होती है। सेवा भी एक प्रकार का सुकृत है।
गृहस्थ भी अपने जीवन में देखे कि कहीं कोई झूठ तो नहीं बोला, कोई गलत साइन तो नहीं किया। आत्मावलोकन से अच्छा शोधन हो सकता है और आदमी अपने भीतर सुधार कर सकता है। इसी प्रकार परिषह आने पर नागराज और गजराज की तरह उन परिषहों को समता भाव के साथ सहन करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने एक विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आज के समय में एआई का उपयोग बढ़ा है। एआई का जितना सहयोग अपेक्षित है उतना तो किया जा सकता है, किन्तु उसके साथ-साथ अपना दिमाग भी सक्षम बना रहना चाहिए। खुद के दिमाग को भी कमजोर नहीं होने देना चाहिए। आधुनिक युग में आर्टिफिशियल इंटिलिजेन्स का कितना उपयोग हो रहा है, उसका साम्राज्य बढ़ा है। आदमी को यह ध्यान देना चाहिए कि एआई के चक्कर में कहीं अपना दिमाग कमजोर न पड़ जाए, यह ध्यातव्य है। अपने दिमाग का भी उपयोग होता रहे। अपनी बौद्धिक क्षमता का विकास होते रहना चाहिए। साधु-साध्वियों में रचनाधर्मिता बनी रहे। सृजन क्षमता कहीं कुंठित न हो, इसका प्रयास होना चाहिए। भाषा की शुद्धि-अशुद्धि का ज्ञान व्याकरण के ज्ञान से ही संभव हो सकता है। परिषहों को सहने की क्षमता, ज्ञानात्मक विकास, बौद्धिकता का उपयोग यथायोग्य होता रहे।













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