जयपुर : महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल, निर्माण नगर में बुधवार को आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में जैन संत मुनिश्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने कहा कि जीवन में सुख और दुःख का वास्तविक आधार बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मनुष्य की दृष्टि और सोच है। उन्होंने कहा, “सुख-दुःख सृष्टि में नहीं, हमारी दृष्टि में है।” यदि हमारी सोच सकारात्मक और सम्यक है तो हर परिस्थिति में आनंद का अनुभव होगा, जबकि विकृत दृष्टिकोण होने पर उपलब्ध सुख भी संतोष नहीं दे पाता।
मुनिश्री ने कहा कि सामान्यतः लोग अपने जीवन में सुख और दुःख की घटनाओं पर अधिक ध्यान देते हैं, जबकि वास्तविक आवश्यकता अपने मन को समझने और उसे स्वस्थ बनाने की है। उन्होंने कहा कि यदि मन संतुलित और स्वस्थ है तो प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी व्यक्ति को विचलित नहीं कर सकतीं, लेकिन यदि मन ही अस्थिर है तो अनुकूल वातावरण भी अशांति का कारण बन जाता है।
अपने प्रवचन में उन्होंने मन की प्रकृति को जल के समान बताते हुए कहा कि पानी स्वभाव से तरल और चंचल होता है। उसमें थोड़ी-सी गंदगी डालने पर वह दूषित हो जाता है, किंतु वही पानी जब बर्फ बनकर स्थिर हो जाता है तो उस पर बाहरी प्रभाव आसानी से नहीं पड़ता। इसी प्रकार चंचल मन छोटी-छोटी बातों से प्रभावित होकर विचलित हो जाता है, जबकि एकाग्र और स्थिर मन संसार की बड़ी से बड़ी चुनौती के सामने भी अपने मार्ग से नहीं डिगता।
इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का मूल संदेश है—”भीतर रहें और बाहर जिएँ।” उन्होंने एक साधक का कथन उद्धृत करते हुए कहा, “बाहर खोजा वह हार गया, भीतर खोजा वह पार गया।” उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से अंतर्मुखी बनने, आत्मचिंतन करने तथा यथार्थ को पहचानने का आह्वान किया। उनके अनुसार बहिर्मुखी व्यक्ति सुख-दुःख के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है, जबकि अंतर्मुखी साधक ज्ञाता-दृष्टा भाव में स्थित होकर स्थायी शांति का अनुभव करता है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ने शांतिनाथ भगवान की स्तुति करवाई तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेक्षाध्यान का अभ्यास कराया। त्याग-प्रत्याख्यान और मंगलपाठ के साथ आध्यात्मिक आयोजन का समापन हुआ।













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