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आकिंचन रहना है सच्ची साधना : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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आकिंचन रहना है सच्ची साधना : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

ममत्व भाव रहित रहने हेतु गुरुदेव ने किया प्रेरित

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July 1, 2026
in आराधना-साधना
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आकिंचन रहना है सच्ची साधना : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं :जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी अपनी धवल सेना के साथ जैन विश्व भारती लाडनूं में सानंद विराजमान है। योगक्षेम वर्ष व्याख्यानमाला के अंतर्गत आचार्यश्री ने आज ‘अमम और आकिंचन रहें’ विषय पर प्रवचन करते हुए उत्तराध्ययन सूत्र के आलोक में साधु जीवन की उत्कृष्ट मर्यादाओं और अपरिग्रह की महत्ता पर विशेष प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने अमम और अकिंचन भाव को आत्म-कल्याण का मूल आधार बताया। साधु साध्वियों की जिज्ञासाओं को भी गुरुदेव ने समाधान प्रदान किया।

सुधर्मा सभा में जनसमुदाय को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा – साधु को अमम और अकिंचन रहना चाहिए। ‘अमम’ शब्द का अर्थ है ममत्व रहित, यानी जिसके भीतर ‘मेरा-मेरा’ का भाव न हो। साधु को अपने शरीर, मकान या किसी भी भौतिक वस्तु में रंच मात्र भी मोह नहीं रखना चाहिए। गृहस्थ जीवन तो परिग्रह और ममत्व से भरा होता है, लेकिन साधु के लिए यह सब सर्वथा त्याज्य है। साधु की सच्ची साधना यही है कि वह अमम रहे और भाव रखे कि संसार में मेरा कुछ भी नहीं है। केवल ज्ञान, दर्शन और चारित्र ही उसका सच्चा धन है। इसी प्रकार अकिंचन का अर्थ है जिसके पास किंचित मात्र भी बाह्य परिग्रह न हो। आगम में बड़ा सुंदर रहस्य बताया गया है कि जो अकिंचन है, वही वास्तव में त्रैलोक्य का अधिपति है, क्योंकि जिसके पास कुछ भौतिक वस्तु है, वह तो केवल उतने ही हिस्से का मालिक है, लेकिन जिसने सब कुछ छोड़ दिया, वह पूरी दुनिया का स्वामी बन जाता है। यही परमात्मा का परम रहस्य है।

आचार्यप्रवर ने आगे कहा कि साधु के लिए परमार्थ के पद – सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र ही वास्तविक स्थान हैं। साधु के मन में संसार के किसी भी संयोग-वियोग या सांसारिक घटना से कभी शोक या दुःख उत्पन्न नहीं होना चाहिए। एक साधु का सच्चा पिता उसके धर्म-गुरु ही होते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने एक बहुरूपिये की मर्मस्पर्शी कथा सुनाकर स्पष्ट किया कि यदि एक नकली साधु का वेश धारण करने वाला बहुरूपिया भी केवल उस वेश की गरिमा और मर्यादा रखने के लिए करोड़ों का धन लेने से मना कर सकता है, तो फिर एक वास्तविक साधक को अपनी संयम और अपरिग्रह की साधना में कितनी दृढ़ता रखनी चाहिए! रुपया-पैसा या किसी भी प्रकार का बाह्य संग्रह साधु की साधना में एक बड़े छेद (दोष) के समान है, जिससे अपनी आत्मा को बचाकर रखना ही प्रत्येक चारित्र आत्मा का परम कर्तव्य है।

 

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