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आत्मा में रमण करना साधु के श्रेयस्कर : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

आत्मा में रमण करना साधु के श्रेयस्कर : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री ने मुनि गजसुकुमाल के जीवन प्रसंग के आख्यान को बढ़ाया आगे 

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August 22, 2024
in आराधना-साधना
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आत्मा में रमण करना साधु के श्रेयस्कर : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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आत्मा में रमण करना साधु के श्रेयस्कर : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
सूरत : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में सूरत में चतुर्मास कर रहे हैं। चतुर्मास प्रवास स्थल उपस्थित जनता को पावन प्रेरणा तो प्राप्त हो ही रही है, इसके साथ-साथ तेरापंथ धर्मसंघ के विभिन्न संस्थाओं द्वारा अनेक-अनेक उपक्रम भी आयोजित हो रहे हैं। इस क्रम में गुरुवार को अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा अलंकरण एवं पुरस्कार सम्मान समारोह का आयोजन किया।
नित्य की भांति गुरुवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि हर आदमी के पास अतिन्द्रिय ज्ञान होना आवश्यक नहीं लगता। केवलज्ञानी तो सर्वज्ञ होते हैं। वे सम्पूर्ण अतिन्द्रिय के धारक, उत्पन्न ज्ञान-दर्शन के धारक अर्हत् होते हैं। उनके भीतर से ज्ञान उत्पन्न हो गया है। केवलज्ञान प्राप्त करने के लिए कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय में पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए किसी प्रकार के प्रमाण पत्र की भी आवश्यकता नहीं होती। चूकि आदमी के पास ऐसे ज्ञान नहीं होते और तो सभी साधुओं में भी नहीं हो सकता, ऐसी स्थिति अर्हतों का उपदेश, उनकी आज्ञा या आगम एक आधार बन सकते हैं। साधुओं के लिए आगम अथवा दूसरे ग्रंथ ही आलम्बनभूत बन सकते हैं। आगम तो ग्रंथ शिरोमणि होते हैं। आगम का अपना महत्त्व है। उसके बाद हमारे धर्मसंघ के आधारभूत ग्रंथ परम पूज्य आचार्यश्री भिक्षु से प्राप्त हुए। आयारो में बताया गया है कि जो साधु अनाज्ञा में वर्तन करते हैं, आत्मा में रमण नहीं करते हैं, अर्हतों के उपदेश का अनुसरण नहीं करते हैं, वे काम-भोगों में अपने चित्त को लगा सकते हैं। साधु बन जाना अच्छी बात है, परन्तु छठे गुणस्थान में प्रमाद हो सकता है।
छठे गुणस्थान प्रमाद आश्रव होता है। आयारो में बताया गया कि जो मुनि अर्हत के उपदेश का अनुसरण नहीं करते हैं, आत्मा में रमण नहीं करते हैं, वे काम-भोग में अपने चित्त को लगा देते हैं। साधु कभी आसक्ति, मोह में चला जा सकता है। और अधिक विषयासक्त हो जाए तो उसका साधुपन भी जा सकता है। छोटी चोरी, गलत बात बोल दे तो साधुपन नहीं जाता, किन्तु दोष लग सकता है। बड़ी चोरी, हिंसा, हत्या में जाने पर साधुपन समाप्त हो जाता है। इसलिए साधु को आत्मरमण करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को अपने संयम के प्रति जागरूक रहे। संयम के प्रति साधु की भावना पुष्ट हो जाए तो साधुपन सुरक्षित रह सकता है। दुनिया में अनेक प्रकार के साधु होते हैं। साधु को अपना मन अनासक्ति में लगाए रखने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके, साधु को अपनी आत्मा में रमण करने का प्रयास करना चाहिए, वह उसके लिए श्रेयस्कर हो सकता है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने मुनि गजसुकुमालजी के आख्यान क्रम को आगे बढ़ाया। अनेक तपस्वियों ने आचार्यश्री से अपनी-अपनी तपस्या का प्रत्याख्यान किया। तदुपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा अलंकरण एवं पुरस्कार सम्मान समारोह का समायोजन हुआ। इस संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रमेश डागा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। वर्ष 2024 के युवा गौरव पुरस्कार अभातेयुप के पूर्व अध्यक्ष श्री विमल कटारिया को तथा आचार्यश्री महाश्रमण युवा व्यक्तित्व पुरस्कार श्री विपीन पितलिया को प्रदान किया गया। श्री कटारिया के प्रशस्ति पत्र का वाचन अभातेयुप के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री पवन माण्डोत, श्री पितलिया के प्रशस्ति पत्र का वाचन उपाध्यक्ष द्वितीय श्री जयेश मेहता ने किया। अलंकरण व पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने अलंकरण/पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं को पावन आशीर्वाद भी प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन अभातेयुप के महामंत्री श्री अमित नाहटा ने किया। नेशनल रेलवे कमेटी मेम्बर श्री छोटू भाई पाटिल ने आचार्यश्री का दर्शन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।
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