लाडनूं : राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के लाडनूं नगर में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, सिद्ध साधक, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘भुक्त भोग का परिणाम कैसा?’ के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आगम में भोग का परिणाम किंपाक फल के समान कटु और गलत परिणाम देने वाला बताया गया है। जिस प्रकार किंपाक फल को खाने का परिणाम अच्छा नहीं होता, इसी प्रकार भुक्त भोगों का परिणाम सुन्दर नहीं होता। किंपाक फल देखने में सुन्दर होता है और खाने में भी स्वादिष्ट होता है। वह लोगों को खाने के लिए अपनी ओर आकर्षित कर सकता है, लेकिन उसके खाने का परिणाम यह होता है कि जीव का प्राणांत तक हो सकता है।
आदमी किसी भी पदार्थ का भोग करता है तो पहले आदमी उस पदार्थ का भोग करता है और बाद में वह पदार्थ आदमी को कई बार भोगने लग जाता है। आदमी को यह ध्यान देना चाहिए कि आदमी ने भोगों को नहीं भोगा, भोगों ने आदमी को भोग लिया। जैसे पहले आदमी शराब पीता है और बाद में शराब आदमी को पीने लग जाती है। पहले आदमी जर्दा, गुटखा आदि खाता है और बाद में ये सभी आदमी को खाने लग जाते हैं। इसी प्रकार कहा गया है कि काल क्या बीता आदमी खुद बीत जाता है। वृद्ध आदमी यह सोचे कि एक समय बचपन का था, कभी युवावस्था भी थी। कभी कोई अपने गुरु की सन्निधि में रहने वाले दिनों को याद कर ले। वे दिन अब बीत गए। आदमी को जितना संभव हो सके, तपस्या भी करने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी यह भी विचार करे कि उसकी तृष्णा बुढ़ी नहीं हुई, आदमी बुढ़ा हो जाता है। बुढ़ापा आने के बाद भी कई तृष्णाएं जस की तस बनी रहती हैं। आदमी को अपनी तृष्णा को यथासंभवतया कम करने का प्रयास करना चाहिए। वृद्धावस्था में तृष्णा, लालसा, अभिलाषा से बचने और समता, शांति में रहने का प्रयास करना चाहिए।
इसलिए आदमी को भोग पर नहीं, उसके परिणाम पर भी ध्यान दे। परिणाम पर ध्यान देने से कभी साधुत्व या वैराग्य की भावना जागृत हो सकती है। आदमी को पदार्थों के प्रति आसक्ति को छोड़कर वैराग्य, साधुत्व की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। जिसे साधुत्व की प्राप्ति हो गई है, उसे अपने आपको संयम और तप से भावित करते हुए विचरण करना चाहिए। साधु के जीवन में संयम और तप की प्रधानता रहे, ऐसा प्रयास हो। साधु के लिए पांच महाव्रतों की उपासना बहुत बड़े सौभाग्य की बात होती है। आदमी को अपनी आत्मा को कषायों से खाली करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने पूज्यप्रवर के समक्ष अपनी-अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया। आचार्यश्री ने सभी के जिज्ञासाओं को उत्तरित किया।













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