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दूसरों पर शासन से पूर्व जरूरी है स्वयं पर अनुशासन : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

दूसरों पर शासन से पूर्व जरूरी है स्वयं पर अनुशासन : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

गुरू के प्रति शिष्य के विनय भाव को पूज्यप्रवर ने किया व्याख्यायित

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March 17, 2026
in आराधना-साधना
Reading Time: 1 min read
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दूसरों पर शासन से पूर्व जरूरी है स्वयं पर अनुशासन : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के मंगल सान्निध्य में योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत जैन विश्व भारती, लाडनूं की पावन धरा पर अलौकिक आध्यात्मिक माहौल बना हुआ है। सैकड़ों साधु-साध्वियों के पावन प्रवास से यहाँ के कण-कण में अध्यात्म की मंगल तरंगें अनवरत प्रवाहित हो रही हैं। धर्मतीर्थ बन चुके इस पावन परिसर में प्रवाहित हो रहे इस आध्यात्मिक रस से सराबोर होने और गुरु दर्शनों का लाभ लेने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु भारी संख्या में यहाँ पहुंच रहे हैं। आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में शांतिदूत आचार्यश्री ने ‘अनुशासन एक उपाय’ के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर प्रेरणा पाथेय प्रदान किया।

सुधर्मा सभा में देशना देते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि ‘अनुशासन’ संगठन और व्यक्ति दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है। दूसरों पर अनुशासन करने के लिए पहली अर्हता यह है कि व्यक्ति स्वयं पर शासन करे। जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, ना वाणी का संयम रखता है और ना ही आचार में निष्ठा, उसे दूसरों पर अनुशासन करने का नैतिक अधिकार नहीं है। इसी संदर्भ में ‘निज पर शासन, फिर अनुशासन’ का उद्घोष अत्यंत प्रासंगिक है। संगठन या समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए सारणा-वारणा, गलतियों पर टोकना और अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करना बहुत आवश्यक है। यदि कोई कुछ भी करे और उसे बताने या समझाने वाला कोई ना हो तो वह संगठन जल्दी धराशायी हो सकता है।

गुरुदेव ने शिष्य की महानता का वर्णन करते हुए फरमाया कि यदि अनुशास्ता से कभी बिना गलती के भी उलाहना मिल जाए, तो भी जो शिष्य उसे विनम्रता से और बिना किसी आवेश के सहन कर लेता है, उस क्षण में वह शिष्य बहुत महान बन जाता है। तेरापंथ धर्म संघ की यह विशेषता रही है कि यहाँ पढ़े-लिखे, विद्वान और दीक्षा व उम्र में बड़े संत-साध्वियां भी अपने से कम उम्र के आचार्य के प्रति पूर्ण विनयभाव रखते हैं। गुरुदेव तुलसी जब 22 वर्ष की उम्र में आचार्य बने थे, तब बड़े-बड़े संतों ने भी उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया और पूर्ण नेतृत्व स्वीकार किया। हमारे धर्म संघ में आज भी डॉक्टर, एमए, लेखक और अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ संत-साध्वियां हैं, सभी अनुशासन की डोर में बंधे रहते हैं। यही विनय, आज्ञाकारिता और अनुशासन हमारे धर्म संघ की बहुत बड़ी गरिमा है, जो संगठन को सुरक्षा और निरंतर विकास की ओर ले जाती है।

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