लाडनूं । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल प्रवास का सौभाग्य प्राप्त कर जैन विश्व भारती परिसर में मानों तीर्थस्थल के समान बना हुआ है, जहां प्रतिदिन श्रद्धालु श्रीमुख से प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा में गोते लगाकर अपने जीवन को धन्य बना रहा है। आचार्यश्री के श्रीमुख से अनवरत प्रवाहित होने वाली इस ज्ञानगंगा में न केवल श्रावक-श्राविका समाज, अपितु बड़ी संख्या में प्रतिदिन चारित्रात्माएं, समणीवृंद व मुमुक्षु श्रेणी भी अभिस्नात होती है। इस कारण ही प्रतिदिन जैन विश्व भारती परिसर में बना सुधर्मा सभा का विशाल परिसर भी मानों जनाकीर्ण-सा नजर आता है।
मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘द्वादशांगविद् भगवान गौतम’ के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि भगवान गौतम तीर्थंकर भगवान महावीर के शिष्य थे और भगवान गौतम के पास भी शिष्य संपदा थी। वे ज्ञानी भी थे। द्वादशांगविद् अर्थात् द्वादश अंगों के वेत्ता थे। वर्तमान समय में द्वादशांगविद् कोई न भी बन पाए तो एकादशांगविद् बनने का प्रयास किया जा सकता है। भगवान गौतम के पास मति श्रुत ज्ञान भी रहा। भगवान गौतम को भगवान महावीर का कितना सान्निध्य मिला था। वे आगम के वेत्ता थे। वे ज्ञानी संत थे, वे भगवान महावीर से प्रश्न करते थे। मानों वे नम्बर वन प्रश्नकर्ता थे। इतने प्रश्न संभवतः किसी ने नहीं किए होंगे, जितने प्रश्न उन्होंने भगवान महावीर से किए थे। प्रश्न करने का कारण ज्ञान करना और दूसरा इसके पूछने से दूसरों को भी इसका ज्ञान प्राप्त हो जाए। वह भी वह ज्ञान एक तीर्थंकर भगवान के श्रीमुख से आएगी तो प्रामाणिक बात हो जाएगी। आज आगम में इतने प्रश्नोत्तर से ही चारित्रात्माओं को बोध मिल पा रहा है।
जो चारित्रात्मा आगमों का कार्य करता है, उसे आगम के गहराई में जाने का अवसर मिल सकता है। संस्कृत छाया और अनुवाद में अभेद रहे, ऐसा प्रयास किया जा सकता है। महामना आचार्यश्री भिक्षु के साहित्य को देखने से पता चल सकता है कि उनके पास कितना ज्ञान और समझाने का कितना अच्छा तरीका था। वे दृष्टांत के माध्यम से बात को समझाने का प्रयास करते थे। उनके भीतर कितना अभय का भाव रहा। उनके पास कितना शास्त्रीय ज्ञान था। वे कितने अच्छे ढंग से कोई विषय समझा देते थे। उसी प्रकार श्रीमज्जयाचार्य को भी प्रज्ञापुरुष कहा गया। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के पास भी कितनी ज्ञान संपदा दी। वे अनुशास्ता और प्रशास्ता भी थे।
वर्तमान में द्वादशांगविद् नहीं बन सकते तो चारित्रात्माएं एक आगम का अच्छा वेत्ता हो जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। आगमों के अध्ययन कर स्वयं वेत्ता बनने का प्रयास होना चाहिए। मंगल प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने मुनि विनयकुमारजी के संदर्भ में फरमाया। मुनि विनयकुमारजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दिया।













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