नई दिल्ली : राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े ‘आपत्तिजनक’ अंश को लेकर उपजे विवाद में नया मोड़ आया है। इस मामले में जुड़े तीन शिक्षाविदों—प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार—ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपना पक्ष रखा है।
याचिका में उन्होंने स्पष्ट किया कि संबंधित सामग्री किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रक्रिया के तहत तैयार की गई थी और इसमें किसी का व्यक्तिगत एकाधिकार नहीं था।
कोर्ट में क्या कहा गया
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि न्यायालय की पूर्व टिप्पणियों से याचिकाकर्ताओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि शिक्षाविद केवल संदर्भ स्पष्ट करना चाहते हैं और नई शिक्षा नीति के अनुरूप तैयार की गई शिक्षण पद्धति को अदालत के सामने रखना चाहते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि पाठ्यपुस्तकों में केवल न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका और निर्वाचन आयोग से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया है।
‘विश्वसनीय शिक्षाविद’ होने का दावा
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि तीनों विशेषज्ञ कोई अस्थायी या अविश्वसनीय व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठित और विश्वसनीय हैं। आलोक प्रसन्न कुमार स्वयं एक अधिवक्ता रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में पेश हो चुके हैं।
प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और सुपर्णा दिवाकर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे. साई दीपक ने भी अदालत में यही पक्ष रखा कि यह कार्य सामूहिक रूप से किया गया था।
अदालत ने इन आवेदनों को रिकॉर्ड में लेते हुए मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद तय की है।
सरकार और समिति का पक्ष
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि विवादित अध्याय की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है। इस समिति में पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रकाश सिंह शामिल हैं।
यह समिति भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के साथ मिलकर काम करेगी, जिसकी अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस कर रहे हैं।
पहले क्या हुआ था
गौरतलब है कि 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इन तीनों विशेषज्ञों से सभी सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों को संबंध तोड़ने का निर्देश दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि इन्हें भविष्य में पाठ्यक्रम निर्माण जैसे कार्यों से दूर रखा जाए।
इससे पहले 26 फरवरी को अदालत ने विवादित अध्याय के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर पूर्ण रोक लगा दी थी।
एनसीईआरटी की माफी
इस मामले में एनसीईआरटी के निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी ने हलफनामा दाखिल कर बिना शर्त माफी भी मांगी है।
अब सुप्रीम कोर्ट आगामी सुनवाई में यह तय करेगा कि शिक्षाविदों की दलीलों और गठित समिति की समीक्षा के आधार पर आगे क्या कार्रवाई की जाए।













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