नई दिल्ली: आइडीबीआइ के विनिवेश की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और देश-विदेशी चार कंपनियों ने इस बैंक में सरकार और एलआइसी की 60 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने का प्रस्ताव भेजा है। इसमें जापान के भी एक वित्तीय संस्थान के शामिल होने की बात सामने आई है। यह पहला मौका होगा, जब किसी विदेशी वित्तीय संस्थान की तरफ से भारत के किसी वित्तीय संस्थान में रणनीतिक हिस्सेदारी खरीदने का प्रस्ताव आया है।
अब आरबीआइ और गृह मंत्रालय आए हुए प्रस्तावों की समीक्षा करेंगे। इसमें तीन से चार महीने का समय लगने की संभावना है। विनिवेश विभाग की मंशा अगले वित्त वर्ष (2023-24) की पहली तिमाही में आइडीबीआइ विनिवेश प्रक्रिया को पूरा करने की है।
आइडीबीआइ का विनिवेश कई मायने में देश की विनिवेश प्रक्रिया के लिए अहम कदम साबित हो सकता है। विनिवेश विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इस बैंक की विनिवेश प्रक्रिया की सफलता से आने वाले दिनों में सरकारी क्षेत्र के दूसरे बैंकों की विनिवेश प्रक्रिया आसान होगी। इसका पहला असर उन दो सरकारी बैंकों के विनिवेश पर पड़ेगा, जिसकी घोषणा आम बजट 2021-22 में की गई थी।
आइडीबीआइ के मामले में हाल ही में शेयर बाजार नियामक एजेंसी सेबी ने कई मामलों को सुलझा दिया है। जैसे सरकारी बैंक में रणनीतिक बिक्री प्रक्रिया के पूरा होने के बाद बची हिस्सेदारी की बिक्री किस तरह से की जाए। वित्तीय संस्थानों में एक बार हिस्सेदारी बेचे जाने के बाद सरकार की भूमिका क्या रहेगी, इसको लेकर भी अब नीतिगत स्पष्टता आ गई है।
पिछले शुक्रवार को सेबी ने आइडीबाआइ विनिवेश के बाद केंद्र सरकार और एलआइसी के पास बीच हिस्सेदारी को पब्लिक होल्डिंग का दर्जा दे दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि मौजूदा विनिवेश प्रक्रिया के बाद केंद्र सरकार या एलआइसी अपनी शेष बची हिस्सेदारी को आसानी से बेच सकेंगे। पहले चरण की विनिवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद एलआइसी और भारत सरकार के पास 30 प्रतिशत हिस्सेदारी बचेगी। ये नियम आने वाले दिनों में दूसरे सरकारी वित्तीय संस्थानों के विनिवेश में भी लागू होंगे।













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