नई दिल्ली। Jammu-Kashmir Elections: अनुच्छेद-370 हटने के बाद पहली बार हो रहे लोकसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर पर देश-दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। यहां की पांच सीट का अंकगणित उलझा हुआ सा है। बाजी किसके पक्ष में जाएगी, कहना मुश्किल है। लेकिन, तमाम मुद्दों के बीच यह चुनाव इस मायने में महत्वपूर्ण है कि अलगाववादियों की भूमिका चुनाव में नहीं है और पाकिस्तान का नाम घाटी में भी प्रासंगिक नहीं नजर आ रहा।
राजनीतिक मामलों के जानकार प्रोफेसर गुल मोहम्मद वानी का कहना है कि यह देखना दिलचस्प है कि अचानक पाकिस्तान पूरे गेम से बाहर हो गया है। घाटी में जो लोग हर बात और यहां की राजनीतिक प्रक्रिया में पाकिस्तान को शामिल करने की मांग करते थे या उसका नाम एक पक्ष के रूप में लेने से नहीं चूकते थे, वे भी अब मान रहे हैं कि पाकिस्तान यहां की जमीन से अब गायब हो रहा है। पाकिस्तान का समर्थन लेने वाले अलगाववादी तत्वों पर कड़े प्रहार से कई तरह के बदलाव हुए हैं, जिनका असर चुनाव में भी देखने को मिल सकता है।
सीमा पार से भड़काने की कोशिश या आतंकवाद के नए तरीकों को आजमाने की मुहिम के बाद भी घाटी में लोग अपने विकास और अपने भाग्य से जुड़े मुद्दों पर ज्यादा बात कर रहे हैं। अनुच्छेद 370 मुद्दा जरूर है, लेकिन स्थानीय समीकरणों के बदलाव में यह कहां कितना असर डाल पाएगा कहना मुश्किल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरों ने भी यहां की सियासी हवा को नया रंग दिया है। भाजपा भी खुद को बड़े प्लेयर के तौर पर स्थापित करने के लिए जोर लगा रही है। वहीं नेशनल कॉन्फेंस (नेकां), पीडीपी हो या कांग्रेस सभी दल भाजपा की इंट्री घाटी में नहीं होने देने के लिए गुणा-भाग कर रहे हैं। फिलहाल, जानकारों की मानें तो यहां इस बार लोकसभा चुनाव कई मायनों में अलग है।
कई सीटों पर बदला समीकरण
जम्मू सीट से राजौरी और पुंछ जिले को हटा दिया गया है। उधमपुर सीट से रियासी जिले को हटाकर जम्मू में जोड़ दिया गया है। ऐसे में जम्मू सीट पर मुस्लिम मतों का प्रभाव कम हुआ है। बारामुला और श्रीनगर सीट पर भी फेरबदल किया गया है। पहले बारामुला सीट में उत्तरी कश्मीर के तीन जिले बारामुला, बांदीपोरा व कुपवाड़ा आते थे, अब इसमें बडगाम के भी दो विधानसभा हलके जोड़ दिए गए हैं। श्रीनगर सीट पर इस बार दक्षिण कश्मीर के पुलवामा और शोपियां जिले के पांच विधानसभा हलकों को जोड़ा गया है। पहले मध्य कश्मीर के श्रीनगर, गांदरबल व बडगाम ही इस संसदीय क्षेत्र में शामिल थे। पहले लोकसभा की अनंतनाग सीट पर कश्मीरियों का ही वर्चस्व था। अब राजौरी-अनंतनाग संसदीय क्षेत्र में राजौरी-पुंछ के सात विधानसभा हलकों के लगभग साढ़े सात लाख वोटर शामिल किए गए हैं। इनमें हिंदुओं के अलावा पहाड़ी और गुज्जर-बकरवाल समुदाय के मतदाता बड़ी संख्या में हैं।
2019 में सभी दलों ने अलग-अलग लड़ा था चुनाव
पहाड़ी और गुज्जर-बकरवाल समुदाय को आरक्षण के बाद यहां सियासी समीकरण भी बदल गए हैं। वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर में भाजपा, पीडीपी, कांग्रेस और नेकां ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। नेकां को कश्मीर की तीन और भाजपा को जम्मू की दो सीटें मिलीं। वर्ष 2024 में भाजपा अलग चुनाव लड़ रही है। नेकां, कांग्रेस, पीडीपी इंडिया गठबंधन में जरूर हैं, लेकिन यहां कौन किसके साथ है, यह तस्वीर साफ नहीं है। गुलाम नबी आजाद ने खुद चुनाव न लड़ने की घोषणा की है। भाजपा का अपना गणित यहां के बदलावों पर निर्भर है। बाजी किसके हाथ लगेगी देखना होगा, लेकिन यहां के चुनाव में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने की पूरी कोशिश नजर आ रही है। खासतौर पर युवाओं को साधने के लिए हर दल अलग-अलग तरीके से मुहिम चला रहा है। आतंकवाद में आई कमी से वोट प्रतिशत कितना बढ़ सकता है, यह भी जम्मू-कश्मीर में एक दिलचस्प पहलू होगा।













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