मध्य-पूर्व की कूटनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिख रही है, जहां समझौतों की भाषा से ज्यादा दबाव की राजनीति सुनी जा रही है। अमेरिकी नेतृत्व और विशेष रूप से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया कूटनीतिक टिप्पणियों ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या क्षेत्रीय शांति अब स्वैच्छिक सहमति का परिणाम रह गई है या फिर रणनीतिक शर्तों और गठबंधनों की मजबूरी बनती जा रही है।
रिपोर्टों और सार्वजनिक बयानों के आधार पर यह संकेत उभरता है कि ईरान के साथ किसी भी संभावित क्षेत्रीय समझौते की रूपरेखा को अब केवल द्विपक्षीय या सीमित बातचीत तक नहीं रखा जा रहा, बल्कि उसे व्यापक क्षेत्रीय पुनर्संरेखण से जोड़ा जा रहा है। इसी संदर्भ में इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने और अब्राहम समझौते को विस्तार देने की बात फिर से केंद्र में लाई गई है।
अब्राहम समझौता मूल रूप से इजरायल और कुछ अरब देशों के बीच संबंध सामान्य करने की ऐतिहासिक पहल थी, जिसे अमेरिकी मध्यस्थता में आगे बढ़ाया गया। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देशों ने इजरायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। अब इस ढांचे को और व्यापक बनाने की चर्चा, विशेषकर सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों के संदर्भ में, क्षेत्रीय राजनीति में नए तनाव और नए सवाल पैदा कर रही है।
इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष पाकिस्तान का रुख है। पाकिस्तान ने हमेशा फिलिस्तीन मुद्दे को अपनी विदेश नीति के वैचारिक आधारों में शामिल रखा है। उसका स्पष्ट और पुराना रुख यह रहा है कि जब तक 1967 की सीमाओं के आधार पर और पूर्वी यरुशलम को राजधानी मानकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं होती, तब तक वह इजरायल को मान्यता नहीं देगा। यही कारण है कि किसी भी संभावित बदलाव को वहां केवल कूटनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि वैचारिक टकराव के रूप में देखा जाता है।
इसी संदर्भ में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और विदेश मंत्री इशाक डार के बयान यह संकेत देते हैं कि इस मुद्दे पर इस्लामाबाद किसी भी प्रकार की राजनीतिक या रणनीतिक नरमी के लिए तैयार नहीं है। उनकी भाषा में यह साफ झलकता है कि इजरायल को लेकर पाकिस्तान का विरोध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि गहरे वैचारिक और घरेलू राजनीतिक दबावों से भी जुड़ा हुआ है।
लेकिन असली सवाल केवल पाकिस्तान या किसी एक देश का नहीं है। सवाल यह है कि क्या मध्य-पूर्व में शांति का नया मॉडल वास्तव में समान भागीदारी पर आधारित है, या फिर यह एक ऐसे सुरक्षा-गुट की संरचना है जिसमें देशों को पहले पक्ष चुनने के लिए कहा जा रहा है और बाद में शांति की शर्तें तय की जा रही हैं?
इजरायल को लेकर अरब दुनिया के भीतर पहले ही एक विभाजन स्पष्ट हो चुका है। कुछ देश व्यावहारिक आर्थिक और सुरक्षा हितों के आधार पर संबंध सामान्य कर चुके हैं, जबकि कुछ अभी भी फिलिस्तीन प्रश्न को केंद्रीय मानते हैं। ऐसे में किसी भी नए दबाव या “सभी को एक ही लाइन में लाने” की कोशिश इस विभाजन को और गहरा कर सकती है, बजाय इसके कि वह उसे हल करे।
सबसे दिलचस्प और जटिल पहलू यह भी है कि ईरान जैसे देश को किसी भविष्य के ढांचे में शामिल करने की संभावना की चर्चा, एक तरफ उसे रणनीतिक विरोधी के रूप में देखने की पुरानी नीति से टकराती है और दूसरी तरफ क्षेत्रीय संतुलन की नई कल्पना पेश करती है। यही विरोधाभास इस पूरे विमर्श को और पेचीदा बना देता है।
एक और महत्वपूर्ण आयाम प्रशासनिक और कानूनी ढांचों का है, खासकर उन देशों में जहां इजरायल को लेकर औपचारिक प्रतिबंध या अस्वीकार की स्थिति बनी हुई है। पाकिस्तान के पासपोर्ट पर मौजूद वह स्पष्ट वाक्य—जिसमें इजरायल को छोड़कर सभी देशों की मान्यता का उल्लेख है—सिर्फ एक दस्तावेजी पंक्ति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक घोषणा है। ऐसे में किसी भी बदलाव की स्थिति केवल विदेश नीति का प्रश्न नहीं रहेगी, बल्कि घरेलू कानून, पहचान और राजनीतिक स्वीकार्यता की परीक्षा भी बन जाएगी।
आज की स्थिति यह संकेत देती है कि मध्य-पूर्व की कूटनीति अब केवल सीमाओं और समझौतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पहचान, विचारधारा और सुरक्षा संरचना के पुनर्गठन का मंच बन चुकी है। और इसी वजह से हर नया प्रस्ताव शांति की उम्मीद के साथ-साथ नए तनावों की संभावना भी लेकर आता है।
यह पूरा घटनाक्रम एक बुनियादी प्रश्न छोड़ जाता है—क्या क्षेत्रीय शांति का भविष्य सहमति से बनेगा, या फिर शर्तों और गठबंधनों के दबाव में आकार लेगा?













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