फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वक्तव्य केवल समुद्री सुरक्षा पर एक औपचारिक टिप्पणी नहीं था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उपस्थिति में उन्होंने जिस “विश्वास के संकट” की बात की, वह दरअसल आज की वैश्विक राजनीति पर एक सीधा और गंभीर प्रश्नचिह्न था।
दुनिया लंबे समय से संसाधनों, ऊर्जा और व्यापार की चुनौतियों की चर्चा करती रही है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया जो इन सभी संकटों की जड़ में है—राष्ट्रों के बीच घटता विश्वास। यह एक ऐसा संकट है जिसने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को संदेह, प्रतिस्पर्धा और टकराव की दिशा में धकेल दिया है।
समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर उनका जोर भी केवल व्यापारिक चिंता नहीं था। यह उन शक्तिशाली देशों के लिए एक स्पष्ट संदेश था जो वैश्विक स्थिरता की बात तो करते हैं, लेकिन अपने रणनीतिक हितों के कारण कई बार अस्थिरता को बढ़ावा देने वाली नीतियों से पीछे नहीं हटते। विश्व व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्रों के रास्ते संचालित होता है। यदि ये मार्ग असुरक्षित होंगे तो उसका प्रभाव केवल बंदरगाहों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी कीमत चुकाएगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी स्पष्ट किया कि समुद्रों की सुरक्षा किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह पूरे विश्व का साझा दायित्व है। यह कथन उन देशों को भी आईना दिखाता है जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को अपनी शक्ति-राजनीति का साधन मानते हैं, न कि सामूहिक जिम्मेदारी का विषय।
उनकी चिंता केवल व्यापार तक सीमित नहीं थी। उन्होंने उन नाविकों और निर्दोष नागरिकों का भी उल्लेख किया जो दुनिया के विभिन्न संघर्षों और तनावों का सबसे बड़ा मूल्य चुका रहे हैं। समुद्र में काम करने वाले हजारों भारतीय नाविक भी इस अस्थिरता से प्रभावित होते हैं। ऐसे में उनका वक्तव्य मानवता को केंद्र में रखने वाली भारत की विदेश नीति का भी परिचायक था।
मोदी का संदेश साफ था—दुनिया को युद्धों, प्रतिबंधों और शक्ति प्रदर्शन की राजनीति से ऊपर उठना होगा। यदि राष्ट्र केवल अपने हितों को सर्वोपरि रखेंगे तो विश्वास का यह संकट और गहराएगा। और जब विश्वास समाप्त हो जाता है, तब न तो समझौते टिकते हैं, न संस्थाएं मजबूत रहती हैं और न ही शांति स्थायी हो पाती है।
संवाद, कूटनीति और सहयोग को ही समाधान बताते हुए प्रधानमंत्री ने उस मूल सत्य को दोहराया जिसे दुनिया बार-बार भूलती रही है। इतिहास गवाह है कि युद्ध भय पैदा कर सकते हैं, लेकिन विश्वास नहीं। शक्ति संतुलन स्थापित कर सकती है, लेकिन स्थायी शांति नहीं।
जी-7 के मंच से भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल आर्थिक शक्ति बनने की आकांक्षा नहीं रखता, बल्कि वैश्विक स्थिरता और जिम्मेदार नेतृत्व का पक्षधर भी है। प्रधानमंत्री मोदी का यह वक्तव्य समुद्री सुरक्षा से कहीं आगे जाकर उस गहरे संकट को उजागर करता है जिससे आज पूरा विश्व जूझ रहा है—विश्वास का संकट।
और यदि दुनिया ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में समुद्रों से लेकर सीमाओं तक, हर मोर्चे पर अस्थिरता की कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ सकती है।













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