सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कथित सहयोगी प्रेम प्रकाश को जमानत देते हुए कह कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद है”। कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत आने वाले मामलों पर भी लागू होता है। आपको बता दें कि हाईकोर्ट ने प्रेम प्रकाश को जमानत देने से इनकार कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस दौरान मनीष सिसोदिया को दी गई जमानत का भी जिक्र किया। यमूर्ति बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा, “मनीष सिसोदिया के फैसले पर भरोसा करते हुए हमने कहा है कि पीएमएलए में भी जमानत एक नियम है और जेल अपवाद है। व्यक्ति की स्वतंत्रता हमेशा नियम होती है और कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया द्वारा वंचना अपवाद होती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पीएमएलए के तहत दर्ज किए गए आरोपी द्वारा जांच अधिकारी के समक्ष दिए गए इकबालिया बयान आमतौर पर सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं होंगे। इसने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत इस तरह के बयानों पर रोक लागू होगी।
सुप्रीम कोर्ट नने कहा, ”हमारा मानना है कि अगर अपीलकर्ता के बयानों में दोष साबित होता है तो वे धारा 25 के तहत आएंगे। बयान को सिर्फ इसलिए स्वीकार्य बनाना हास्यास्पद होगा क्योंकि वह तब एक अन्य ईसीआईआर के लिए हिरासत में था। इस तरह के बयानों को स्वीकार्य बनाना बेहद अनुचित होगा क्योंकि यह न्याय के सभी सिद्धांतों के खिलाफ होगा।”
प्रेम प्रकाश को जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट ने उनकी लंबी कैद और बड़ी संख्या में गवाहों के कारण मुकदमे में हुई देरी को ध्यान में रखा। पीठ ने यह भी माना कि प्रकाश प्रथम दृष्टया अपराध के दोषी नहीं थे और उनके द्वारा साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की संभावना नहीं थी। इसलिए अदालत ने 5 लाख रुपये का जमानत बांड पर उन्हें जमानत दे दी।













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