जननायक महाराजा गुलाब सिंह स्वर्णिम भारतीय इतिहास के एक साहसी सेनानायक, महत्वपूर्ण युगपुरुष, अविस्मरणीय व्यक्तित्व, अदभुत रणनीतिकार, कुशल प्रशासक तथा राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा रखने वाले राजा थे। सेनानायक से जननायक महाराजा बनने की गुलाब सिंह की जीवन यात्रा विभिन्न उतार चढ़ाव से गुजरते हुए सम्पूर्णता प्राप्त करती है।
गुलाब सिंह के व्यक्तित्व की विशेषताओं को पहचानते हुए महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें निरन्तर प्रोत्साहित किया तथा विभिन्न जिम्मेदारियां दी जाती रही। गुलाब सिंह ने भी सदैव पूरी निष्ठा के साथ प्रत्येक जिम्मेदारी का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। जिसके फलस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह का गुलाब सिंह के प्रति ध्यान
बढ़ता गया। महाराजा रणजीत सिंह ने स्वयं 17 जून, वर्ष 1822 में चन्द्रभागा ( चिनाब ) नदी के तट पर गुलाब सिंह का राजतिलक किया तथा उन्हें राजा की उपाधि प्रदान की और जम्मू कश्मीर क्षेत्र का राजा नियुक्त किया था।
विपरीत दिशा में हुआ था राजतिलक
राजा गुलाब सिंह के इस राजतिलक के विषय में एक किवदंती यह भी प्रचलित है कि महाराजा रणजीत सिंह ने इनके मस्तक पर राजतिलक ऊपर से नीचे की तरफ अर्थात विपरीत दिशा में किया था। जबकि सामन्यतः तिलक सदैव नीचे से ऊपर की दिशा में किया जाता है। इस विपरीत दिशा में किये गए राजतिलक के संदर्भ में लोकमत तथा लोककथाओं के अनुसार महाराजा रणजीत सिंह ने राजा गुलाब सिंह के व्यक्तित्व में उस महान शासक को देखा था जो जम्मू कश्मीर के विशाल पर्वतों से नीचे की दिशा में आकर उस समय भारत मे निरन्तर फैलते जा रहे अंग्रेजी साम्राज्य को रोकने की क्षमता रखता था।
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात महाराजा गुलाब सिंह ने उनके इस आंकलन को सत्य सिद्ध किया था जब उन्होंने लाहौर दरबार को ना केवल अंग्रेजों के अधिकार में जाने से बचाया था अपितु जम्मू कश्मीर को भी अंग्रेजी साम्राज्य का हिस्सा बनने से बचाया था। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा राजा गुलाब सिंह का विपरीत दिशा में किया गया यह राजतिलक सांकेतिक रूप से भारतीय जनमानस को अंग्रेजो के विरुद्ध संगठित होकर अंग्रेज साम्राज्य को समाप्त करने के लिए एक प्रेरणा था।
महाराजा की दूर की सोच गुलाब सिंह को सिंहासन तक ले आई
महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा गुलाब सिंह को जम्मू कश्मीर के राजसिंहासन पर बैठाना दो राष्ट्रपुरुषों की मित्रता मात्र नहीं थी और न ही यह केवल गुलाब सिंह को महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य के विस्तार करने का पारितोषिक मात्र था, अपितु इसके दूर भविष्यगामी, महत्वाकांक्षी, राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सैन्य रणनीतिक उद्देश्य थे।
महाराजा रणजीत सिंह के बारे मे ऐतिहासिक जानकारी के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है वह एक लोकप्रिय युगप्रवर्तक जननायक होने के साथ ही बहुत दूरदृष्टि वाले महान शासक थे, जो अपने सेनानायकों, मंत्रिपरिषद, राजकीय सलाहकारों तथा मित्रों की योग्यता को समझकर उसी के अनुरूप राजकीय दायित्व उक्त व्यक्ति को सौंपते थे। महाराजा रणजीत सिंह एक सच्चे राष्ट्रभक्त तथा कुशल राजनीतिज्ञ थे।
महाराजा रणजीत सिंह ने वर्ष 1809 में अंग्रेजो के साथ शान्ति संधि की थी जिसके अनुसार दोनों पक्षों का सतलुज नदी के आर पार शान्ति समझौता था। इस सन्धि के कारण ना केवल सिख साम्राज्य व अंग्रेजों के मध्य संघर्ष की स्थिति टली अपितु इस क्षेत्र में महाराजा रणजीत सिंह की प्रसिद्धि बढ़ गयी।
महाराजा रणजीत सिंह सदैव व्यक्ति की योग्यता को रिश्तों, मित्रता अथवा मिथ्या प्रशंसकों से ऊपर महत्व प्रदान करते थे। वह इस बात से भली भांति परिचित थे कि एक योग्य सेनानायक एवं कुशल प्रशासनिक व्यक्ति उनके राज्य की अस्मिता व अखण्डता को बनाये रखने के साथ ही राज्य विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, ना कि कोई रिश्तेदार, मित्र अथवा चापलूस व्यक्ति।
विदेशियों पर नहीं था भरोसा
अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण महाराजा रणजीत सिंह ने छोटी छोटी रियासतों को अपने राज्य में विलय करके एक संगठित व शक्तिशाली पंजाब राज्य का गठन किया तथा सप्त सिंधु क्षेत्र के जम्मू कश्मीर तथा अन्य प्रान्तों को भी अपने राज्य में सम्मिलित किया था। महाराजा रणजीत सिंह ने अपने राज्य की समृद्धि, विकास तथा विस्तार के लिए अनेक विदेशी व्यक्तियों की सेवाएं ली परन्तु कभी भी इन विदेशी व्यक्तियों को अपने निर्णायक मंडल में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान नहीं किये।
उनके राजदरबार में अंग्रेज, फ्रांसीसी, जर्मन, इतालवी आदि देशों के विदेशी चिकित्सक, सैन्य उपकरण तथा प्रशिक्षण विशेषज्ञ, आधुनिक सैन्य प्रशिक्षक उपस्थित थे, परन्तु यह महाराजा रणजीत सिंह की उन विदेशियों पर अविश्वास की नीति ही थी कि उन्होंने कभी भी इन विदेशियों को महत्वपूर्ण पदों पर आसीन नहीं किया।
महाराजा रणजीत सिंह एक महान शासक थे तथा वह अपने पूर्वजों के इतिहास तथा आसपास के राजपरिवारों के इतिहास से भी भली भांति परिचित थे। महाराजा रणजीत सिंह के दादा महान सिंह के राजा ए राजा रणजीत देव के पुत्र बृजलाल देव से सम्बंध थे। राजा ए राजा रणजीत देव जम्मू के जामवाल राजपरिवार से थे तथा राजा गुलाब सिंह इन्ही के वंशज थे। राजा ए राजा रणजीत देव ने 1728 ईo से 1780 ईo तक लगभग 6 दशक तक जम्मू पर शासन किया।
राजा गुलाब सिंह का सैन्य, राजनीतिक, कूटनीतिक व प्रशासनिक प्रशिक्षण इनके दादा जनरल जोरावर सिंह ( इन्हें भारत का नेपोलियन कहा जाता है ) तथा उनके बड़े भाई वज़ीर मोता सिंह (राजा ए राजा रणजीत देव के जम्मू रियासत के वज़ीर ) के संरक्षण में हुआ था। राजा गुलाब सिंह के महाराजा रणजीत सिंह की सेना में शामिल होने के विषय मे अनेक भ्रांतिया फैलायी गयी हैं जिसका मुख्य कारण अंग्रेज इतिहासकारों तथा अंग्रेज़ अधिकारियों का राजा गुलाब सिंह के प्रति ईष्या भाव तथा राजनीतिक उद्देश्य रहे हैं। इसी कारण इन्होंने राजा गुलाब सिंह को पैदल सैनिक के रूप में सेना में भर्ती होने का वर्णन किया है जो कि वास्तविकता से पूर्णतः अलग तथ्य है।
महाराजा रणजीत सिंह के द्वारा जम्मू की जागीरें राजा गुलाब सिंह को सौंपते हुये यह वर्णन किया गया है कि गुलाब सिंह के पूर्वज राजा ए राजा रणजीत देव तथा बृजलाल जम्मू के शासक रहे हैं। इस प्रकार यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह को राजा गुलाब सिंह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के विषय में कोई शंका नहीं थी तथा उन्होंने गुलाब सिंह को अपनी सेना में एक सैन्य दल के नायक के रूप में 275 नानकशाही रुपयों के वेतन पर नियुक्त किया था। गुलाब सिंह के भाई ध्यान सिंह को भी महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी राजसभा में न्याय विभाग में 60 नानकशाही रुपयों के मासिक वेतन पर नियुक्त किया था।
महाराजा रणजीत सिंह की सेना में गुलाब सिंह की ऐसे हुई शुरुआत
गुलाब सिंह सन 1809 ईo में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में एक सैन्य दल के नायक के रूप में शामिल हुए तथा अपने सैन्य कौशल एवं रणनीतिक दक्षता के फलस्वरूप विभिन्न अभियानों में निरंतर विजय प्राप्त करते हुए महाराजा रणजीत सिंह के लिए सिख साम्राज्य के विस्तार एवं स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों का निर्वहन किया, जिसके फलस्वरूप वह महाराजा रणजीत सिंह के लिए अधिक महत्वपूर्ण होते चले गए।
बहादुरी की झलक
राजा गुलाब सिंह ने अपने साहसिक अभियानों तथा रणनीतिक कौशल से महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य (लाहौर साम्राज्य ) का विस्तार ल्हासा, पाश्मीना, लद्दाख, तिब्बत, सिल्क रूट तथा गिलगित बाल्टिस्तान के दुर्गम क्षेत्रों तक किया था। राजा गुलाब सिंह ने सदैव ना केवल अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूर्ण निष्ठा से किया अपितु हर स्थिति में अपनी शासकीय तथा रणनीतिक क्षमताओं को सिद्ध भी किया।
राजा गुलाब सिंह ने ना केवल सिख साम्राज्य का विस्तार दुर्गम क्षेत्रों तक किया अपितु अपने साहसिक नेतृत्व एवं रणनीतिक सुझबूझ से उन्होंने सिख साम्राज्य के विरुद्ध होने वाले विद्रोहों का भी सफलतापूर्वक दमन किया। राजा गुलाब सिंह द्वारा जिन अनेकों विद्रोहों का दमन किया गया उनमे से दिदो विद्रोह एवं अफगान
विद्रोह प्रमुख हैं।
वर्ष 1821 ईo में गुलाब सिंह ने दिदो विद्रोह के नेता दिदो जामवाल को पकड़ लिया तथा उसकी हत्या करके दिदो विद्रोह का दमन कर दिया। वर्ष 1827 ईo में सिख सेना के कमांडर इन चीफ हरि सिंह नलवा के द्वारा शैदु के युद्ध मे अफगान विद्रोहियों का दमन करने में भी राजा गुलाब सिंह की अग्रणी भूमिका रही थी। वर्ष 1837 ईo में जब सिख सेना के महान नायक हरि सिंह नलवा की मृत्यु के उपरांत जब जम्मू कश्मीर के अधिकांश हिस्सों में मुस्लिम विद्रोहियों ने विद्रोह करना प्रारंभ कर दिया था, उस समय राजा गुलाब सिंह को ही इन विद्रोहों के दमन का उत्तरदायित्व सौंपा गया था।
पूंछ, मुरी, हजारा, धूंड, सती, तानोली, कर्रल और सुधान क्षेत्रों में सिख साम्राज्य के विरुद्ध होने वाले प्रत्येक विद्रोह का दमन राजा गुलाब सिंह ने बहुत आक्रामकता तथा सुझबूझ के साथ किया था। राजा गुलाब सिंह ने उनके संदर्भ में महाराजा रणजीत सिंह की दूरदर्शिता को सही साबित करते हुए 22 छोटी छोटी रियासतों में विभक्त जम्मू कश्मीर को संगठित करके सिख साम्राज्य को और अधिक सशक्त, सामर्थ्यवान एवं शक्तिशाली बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजा गुलाब सिंह की सिख साम्राज्य एवं महाराजा रणजीत सिंह के प्रति सच्ची निष्ठा ही थी कि उन्होंने सिख दरबार द्वारा सौंपे गए सभी उत्तरदायित्वों का पूरी निष्ठा से सफलतापूर्वक निर्वहन किया। वर्ष 1834 ईo से लेकर 1840 ईo तक लद्दाख तथा बाल्टिस्तान को सिख साम्राज्य का हिस्सा बनाने के पश्चात वर्ष 1842 ईo में तिब्बत तक महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य के विस्तार के लिए सेना भेजी और अन्ततः तिब्बत पर अधिकार भो प्राप्त किया।
बढ़ती गईं जिम्मेदारियां
उनकी इन्हीं विशेषताओं ने उन्हें महाराजा रणजीत सिंह के विश्वासपात्रों की पंक्ति में सबसे आगे खड़ा कर दिया था।महाराजा रणजीत सिंह का गुलाब सिंह के प्रति बढ़ते विश्वास का ही प्रमाण था कि वर्ष 1831 से 1839 ईo तक महाराजा रणजीत सिंह द्वारा राजा गुलाब सिंह को उत्तरी पंजाब की जागीरों के अतिरिक्त पंजाब के कईं अन्य शहरों जैसे झेलम, भेरा, रोहतास की जागीरें भी सौंपी गयी थी।
इनके अतिरिक्त गुजरात की नमक की खानों की जागीर भी राजा गुलाब सिंह को महाराजा रणजीत सिंह द्वारा प्रदान की गई थी। राजा गुलाब सिंह ने सदैव महाराजा रणजीत सिंह और लाहौर दरबार के प्रति सच्ची निष्ठा रखी। उस समय भी, जब महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात लाहौर दरबार मे सत्ता संघर्ष की स्थिति थी और महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारियों के मध्य के इस सत्ता संघर्ष में राजा गुलाब सिंह के भाइयों तथा भतीजों की हत्या तक भी की गई थी। उसके उपरांत भी राजा गुलाब सिंह ने लाहौर दरबार मे स्थिरता लाने के लिए पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य किया।
अंग्रेजों तथा लाहौर दरबार के मध्य युद्ध को स्थगित करने के लिए राजा गुलाब सिंह ने लाहौर दरबार के प्रति अपनी निष्ठा के अंतर्गत ही मध्यस्थता की थी। राजा गुलाब सिंह की लाहौर दरबार के प्रति निष्ठा का लिखित प्रमाण 11 एवं 13 फरवरी, 1846 में सर हेनरी लॉरेन्स द्वारा राजा गुलाब सिंह को लिखे गए दो पत्रों
तथा राजा गुलाब सिंह द्वारा दिये गए इन पत्रों के उत्तर से प्राप्त होता है।
इन पत्रों में सर हेनरी लॉरेन्स राजा गुलाब सिंह को लाहौर दरबार द्वारा की गई उनके भाइयों एवं भतीजों की हत्याओं तथा स्वयं उनके साथ किये गए दुर्व्यवहार का स्मरण दिलाते हुए उन्हें अलग स्वतन्त्र राज्य के रूप में जम्मू कश्मीर राज्य का स्वतंत्र राजा बनाने का प्रलोभन देता है। परन्तु राजा गुलाब सिंह ने उनके इन पत्रों के प्रत्युत्तर में इसे लाहौर दरबार का आन्तरिक मामला बताते हुए तथा उस सत्ता संघर्ष के समय महाराजा दिलीप सिंह के बच्चा होने एवं उनकी इस घटना में कोई भी भूमिका ना होने की बात स्पष्ट करते हुए सर हेनरी लॉरेन्स के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
इसके उपरांत लाहौर दरबार तथा अंग्रेजों के मध्य युद्ध विराम संधि के अंतर्गत सतलुज तथा व्यास नदियों के मध्य के समस्त क्षेत्र सहित 75 लाख नानकशाही रुपये हर्जाने के रूप में अंग्रेजों को देने तय पाए गए थे। सतलुज तथा व्यास नदी के मध्य के सम्पूर्ण क्षेत्र को अंग्रेजों को सौंपने पर तो लाहौर दरबार तैयार था परंतु इसके अतिरिक्त 75 लाख नानकशाही रुपये नकद अंग्रेजों को देने में तत्कालीन वज़ीर लाल सिंह ने असमर्थता व्यक्त की। इन 75 लाख नानकशाही रुपयों के स्थान पर लाल सिंह ने जम्मू कश्मीर के प्रदेश अंग्रेजों को सौंपने का प्रस्ताव रखा था।
वज़ीर लाल सिंह के इस प्रस्ताव ने राजा गुलाब सिंह को जम्मू कश्मीर के उस प्रदेश को, जो उन्हें महाराजा रणजीत सिंह ने दिया था को लाहौर दरबार तथा अंग्रेजों से स्वतन्त्र राज्य के रूप में प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। यहां यह तथ्य ध्यातव्य है कि जम्मू कश्मीर को 75 लाख नानकशाही रुपयों के बदले अंग्रेजों को सौंपने का प्रस्ताव तत्कालीन असमर्थ वज़ीर लाल सिंह के द्वारा दिया गया था। 9 मार्च, 1846 ईo को अंग्रेजों तथा लाहौर दरबार के मध्य हुई लाहौर सन्धि के अंतर्गत महाराजा दिलीप सिंह ने राजा गुलाब सिंह को स्वतंत्र रूप से जम्मू कश्मीर का शासक स्वीकार करते हुए उन्हें अंग्रेजों के साथ इस सम्बंध में अलग से सन्धि करने की भी स्वीकृति प्रदान की थी।
नानकशाही रुपयों की रकम अंग्रेजों को दी
9 मार्च, 1846 ईo की इस लाहौर सन्धि के सात दिन बाद 16 मार्च को स्वतंत्र महाराजा के रूप में महाराजा गुलाब सिंह ने अंग्रेजों के साथ अमृतसर सन्धि की, जिसमें लाहौर दरबार द्वारा अंग्रेजों के साथ की गई सन्धि के अंतर्गत तय 75 लाख नानकशाही रुपयों की रकम, जिसे देने में लाहौर दरबार ने असमर्थता प्रकट की थी, महाराजा गुलाब सिंह ने अपने पक्ष से अंग्रेजों को देना स्वीकार किया था।
इन तथ्यों के प्रकाश में यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा गुलाब सिंह ने जम्मू कश्मीर को अंग्रेजों से सौदेबाजी करके नहीं खरीदा था, अपितु लाहौर दरबार द्वारा 75 लाख नानकशाही रुपयों के बदले में जम्मू कश्मीर को अंग्रेजों के हाथों में जाने से बचाया था और सन्धि के अंतर्गत उस जम्मू कश्मीर के स्वतंत्र महाराजा बने थे जो उन्हें महाराजा रणजीत सिंह ने स्वयं प्रदान किया था। इस से एक तथ्य यह भी स्पष्ट होता है कि महाराजा रणजीत सिंह ने जो विरासत राजा गुलाब सिंह को सौंपी थी उन्होंने इस आपात समय में उस विरासत की रक्षा अंग्रेजों तथा असक्षम तथा षड्यंत्रों में घिरे लाहौर दरबार से भी की थी।
यहां पर यह तथ्य भी ध्यातव्य है कि महाराजा गुलाब सिंह ने लाहौर दरबार के तत्कालीन वज़ीर लाल सिंह के द्वारा अंग्रेजों को 75 लाख नानकशाही रुपयों के एवज में जम्मू कश्मीर का सम्पूर्ण क्षेत्र सौंपने के प्रस्ताव के बाद ही जम्मू कश्मीर पर स्वतन्त्र आधिपत्य की दिशा में विचार किया था। महाराजा गुलाब सिंह ने कभी भी स्वार्थ अथवा षड़्यांत्रिक रूप से जम्मू कश्मीर पर कब्ज़ा करने अथवा लाहौर दरबार के प्रति विश्वासघात करने का विचार भी कभी अपने अन्तर्मन में उत्तपन्न नहीं होने दिया।
यहां तक कि महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के उपरांत उनके उत्तराधिकारियों में होने वाले सत्ता संघर्ष की स्थिति में तथा इस सत्ता संघर्ष में अपने भाइयों एवं भतीजों की हत्या हो जाने के बाद भी राजा गुलाब सिंह बिना विचलित हुए लाहौर दरबार को इस अस्थिरता की स्थिति से उबारने के लिए प्रयासरत रहे।
जब महाराजा के निधन के बाद गुलाब सिंह ने घर में ही नाराजगी का सामना किया
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात सिख दरबार में ऐसे लोगों का प्रभाव बढ़ने लगा था जो राजा गुलाब सिंह तथा जम्मू परिवार के प्रति ईष्या तथा दुर्भावना रखते थे। इसी कारण महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों के मध्य सत्ता प्राप्ति के लिए होने वाले संघर्ष में षडयांत्रिक रूप से जम्मू
परिवार के सदस्यों की हत्या की गई।
इन घटनाओं ने राजा गुलाब सिंह की लाहौर दरबार तथा महाराजा रणजीत सिंह के प्रति निष्ठा को तो प्रभावित नहीं किया, परन्तु इस घटनाक्रम ने राजा गुलाब सिंह को यह संदेश दे दिया कि लाहौर दरबार मे अब ऐसे लोग प्रभुत्वशाली हो गए हैं जिनके साथ उनके हित तथा जीवन सुरक्षित नहीं है। अतः राजा गुलाब सिंह ने रणनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए तत्कालीन परिस्थितियों में भी लाहौर दरबार के हितों को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों के साथ हुई लाहौर दरबार की युद्ध विराम की संधि को पूर्ण भी किया तथा अमृतसर संधि के द्वारा जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया था।
महाराजा गुलाब सिंह का व्यक्तित्व उन्हें एक राष्ट्रभक्त नायक, निष्ठावान प्रशासक, साहसी सेनानायक, कुशल रणनीतिकार तथा अंततः सशक्त जननायक के रूप में प्रतिस्थापित करता है। उन्होंने कभी भी संघर्ष की स्थिति से पलायन नहीं किया अपितु और अधिक कर्तव्यनिष्ठा एवं परिपक्वता के साथ संघर्ष की स्थिति का सामना किया तथा प्रत्येक बार सफलता प्राप्त की।
16 मार्च, 1846 ईo में हुई अमृतसर संधि के अनेक बिन्दुओ के संकीर्ण मानसिकता युक्त आंकलन के आधार पर महाराजा गुलाब सिंह के व्यक्तित्व पर कुछ तथाकथित इतिहासकार लांछनीय प्रश्न खड़े करते रहे हैं, परन्तु अमृतसर संधि में सम्मिलित प्रत्येक बिंदु का तत्कालीन लाहौर दरबार तथा अंग्रेजों के मध्य संघर्ष की स्थिति, लाहौर दरबार की आंतरिक सत्ता संघर्ष की स्थिति, तथा राजा गुलाब सिंह की इन वास्तविक कठिन परिस्थितियों में भूमिका का सूक्ष्म विश्लेषण करने के उपरांत महाराजा गुलाब सिंह के व्यक्तित्व के कुशल राजनीतिज एवं रणनीतिकार पक्ष का प्रकटीकरण सामने आता है।
तत्कालीन परिस्थितियों में लाहौर दरबार तथा अंग्रेजों के मध्य संघर्ष विराम, जम्मू कश्मीर जैसा भू-राजनीतिक एवं भू-रणनीतिक रूप से अति महत्वपूर्ण विशाल भौगोलिक क्षेत्र अंग्रेजों के हाथों में जाने से रोकना, स्वयं को लाहौर दरबार मे चल रहे षडयन्त्रों से अलग तथा सुरक्षित करना, यह सब महत्वपूर्ण तथ्य महाराजा गुलाब सिंह के वास्तविक महान व्यक्तित्व तथा कुशल रणनीतिकार पक्ष को ही सर्वसमक्ष करते हैं।
कभी नहीं छोड़ी ईमानदारी
महाराजा गुलाब सिंह ने आजीवन राष्ट्रभक्ति, ईमानदारी तथा कर्तव्यनिष्ठा का दामन नहीं छोड़ा। महाराजा रणजीत सिंह के प्रति उनकी अगाध निष्ठा रही तथा लाहौर दरबार के प्रति वयः सदैव ईमानदार रहे। लाहौर दरबार की आंतरिक सत्ता संघर्ष की स्थिति के समय भी राजा गुलाब सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह की
विरासत में स्थिरता लाने के लिए सच्चे हृदय से प्रयास किये थे। अंग्रेजों के विरुद्ध लाहौर दरबार की पतनात्मक स्थिति में भी राजा गुलाब सिंह ने अपनी रणनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए ना केवल लाहौर दरबार को संकट की स्थिति से निकाला था, अपितु जम्मू कश्मीर जैसे विशाल एवं महत्वपूर्ण क्षेत्र को अंग्रेजों के हाथों में जाने से बचाया था।
महाराजा गुलाब सिंह के जीवन का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा गुलाब सिंह वास्तविक अर्थ में सच्चे राष्ट्रभक्त थे, उनका प्रत्येक कार्य राष्ट्रहित के परिपेक्ष्य में ही निहित था।
(लेखक- डॉ. मलकीत सिंह, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्याल में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
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