लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का पावन प्रवास कर रहे हैं। लगभग 37 वर्षों बाद तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता द्वारा किया जाने वाला योगक्षेम वर्ष मानों पूरे तेरापंथ धर्मसंघ को आह्लादित करने वाला है। योगक्षेम वर्ष में अपने आराध्य के निकट सेवा, दर्शन, उपासना की कामना के साथ देश-विदेश में रहने वाले तेरापंथी श्रद्धालु जैन विश्व भारती के रमणीय परिसर में उपस्थित हो रहे हैं और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त भी कर रहे हैं। धीरे-धीरे गर्मी का प्रभाव भी बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद जैन विश्व भारती परिसर में व्याप्त हरियाली व वृक्षों की उपस्थिति, मयूर व अन्य पक्षियों के कलरव से प्राकृतिक वातावरण आगंतुकों का मन मोह रहा है। अनेकानेक धार्मिक, आध्यात्मिक, व संगठनात्मक कार्यक्रम भी हो रहे हैं। सुधर्मा सभा के विशाल प्रवचन पण्डाल में प्रतिदिन चतुर्विध धर्मसंघ अपने अनुशास्ता की मंगलवाणी के श्रवण का लाभ प्राप्त करने के साथ-साथ अपनी जिज्ञासाओं समाधान प्राप्त कर भी मानसिक शांति का अनुभव कर रहे हैं। 20 अप्रैल को युगप्रधान अनुशास्ता की मंगल सन्निधि मंे अक्षय तृतीया महोत्सव का भी भव्य समायोजन निर्धारित है। इस आयोजन करीब चार सौ से अधिक तपस्वी आचार्यश्री को ईक्षु रस का दान कर व्रत को सम्पन्न करेंगे। इसके लिए देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम प्रारम्भ है। आयोजन को भव्य बनाने में योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति जुटी हुई है।
रविवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि साधु की चर्या में पांच समितियों की बात आती है। जो समितियों से युक्त होता है, वह समित हो जाता है। आगमिक परिभाषा में कहा गया है कि जो प्राणों का अतिपात नहीं करता अर्थात् जिसके जीवन में अहिंसा हो, सम्यक् प्रवृत्ति वाला हो, वह समित होता है। पांचों समितियां मानों अहिंसा पर ही आधारित होती हैं। ईर्या समिति को देखें तो देख-देखकर चलना। भाषा समिति में अहिंसा का दर्शन किया जा सकता है। हमारे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में साधु-साध्वियों को तो खुले मुंह बोलना भी नहीं चाहिए।
गोचरी-पानी, प्रमार्जन-प्रतिलेखन आदि में ध्यान रखना ताकि कहीं हिंसा न हो जाए। ऐसे अहिंसा के पालक को समित कहा जाता है। जो साधु समित होता है, उसके दर्शन से भी पाप झड़ते हैं। साधु का जीवन तो पूर्णतया अहिंसा से ही जुड़ी हुई होती है। अंधेरे में पूंज कर चलना, बैठना है तो रजोहरण से साफ कर बैठना चाहिए। रजोहरण, प्रामर्जनी वस्त्र, कंबल आदि का प्रतिलेखन करने का प्रयास करना चाहिए। कोई चीज से भूल से रह जाए तो उसकी आलोयणा का भी ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों की जिज्ञासाओं को समाहित किया।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
