नई दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि बचपन में हुई गलती को किसी व्यक्ति के पूरे जीवन का कलंक नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि किशोरावस्था में दर्ज मामलों का उपयोग किसी व्यक्ति के भविष्य और रोजगार के अवसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक युवक का पासपोर्ट पुराने किशोर रिकॉर्ड के आधार पर रोक दिया गया था। अदालत ने राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो को संबंधित रिकॉर्ड हटाने के निर्देश दिए।
मामले के अनुसार, वर्ष 2000 में याचिकाकर्ता के नाबालिग होने के दौरान उसके खिलाफ दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी थाने में फर्जी बस पास इस्तेमाल करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। बाद में किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किए जाने पर जुर्माना भरने के बाद उसे रिहा कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि हाल ही में विदेश में नौकरी के लिए पासपोर्ट आवेदन करने पर पुलिस सत्यापन के दौरान पुराना रिकॉर्ड सामने आ गया, जिसके कारण उसका आवेदन निरस्त कर दिया गया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम का उद्देश्य बच्चों और किशोरों को सुधार और पुनर्वास का अवसर देना है। अदालत ने कहा कि कानून यह सुनिश्चित करता है कि बचपन की भूल किसी व्यक्ति के भविष्य पर स्थायी दाग न बने।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रशासनिक एजेंसियों को भी यह समझना चाहिए कि किशोरावस्था में हुई त्रुटियों को जीवनभर की पहचान नहीं बनाया जा सकता। हाईकोर्ट के इस फैसले को किशोर अधिकारों और पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।













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