वॉशिंगटन : अमेरिका के नेतृत्व में चीन के वर्चस्व से क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई चेन को सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया गया है। अमेरिका ने करीब 50 देशों को साथ लेकर एक ट्रेडिंग ब्लॉक बनाने का प्रस्ताव रखा है, जिसका उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स के उत्पादन, प्रोसेसिंग और कीमतों में स्थिरता लाना है।
यह प्रस्ताव 4 फरवरी 2026 को वॉशिंगटन में आयोजित पहले ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ सम्मेलन के दौरान रखा गया। बैठक में साफ संकेत दिया गया कि यह पहल चीन के एकाधिकार को चुनौती देने और भविष्य की उन्नत तकनीकों पर रणनीतिक नियंत्रण सुनिश्चित करने की वैश्विक कोशिश का हिस्सा है।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को मिलकर ऐसा ढांचा तैयार करना होगा, जिसमें टैरिफ और न्यूनतम कीमतों के माध्यम से घरेलू और मित्र देशों के उत्पादकों की सुरक्षा की जा सके। वेंस ने बताया कि अमेरिका रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए ‘बेसलाइन प्राइस’ तय करने पर विचार कर रहा है, ताकि चीन जैसे देश कीमतें गिराकर प्रतिस्पर्धियों को बाजार से बाहर न कर सकें।
उन्होंने कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स की कीमतों को अधिक अनुमानित और कम अस्थिर बनाना जरूरी है, तभी अमेरिका अपनी खनिज उद्योग को दोबारा मजबूत कर पाएगा। प्रस्तावित ट्रेडिंग ब्लॉक को वेंस ने “मित्र और सहयोगी देशों के बीच एक सुरक्षित जोन” बताया, जिसका लक्ष्य आवश्यक खनिजों की निर्बाध आपूर्ति और संयुक्त उत्पादन को बढ़ावा देना है।
अमेरिकी पहल का मुख्य उद्देश्य लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसी रणनीतिक खनिजों की सप्लाई चेन को चीन के प्रभाव से मुक्त करना है। प्रस्ताव के तहत सदस्य देशों के बीच इन खनिजों का बिना बाधा व्यापार होगा और ‘न्यूनतम कीमत’ तय की जाएगी, ताकि चीनी डंपिंग से स्थानीय उत्पादक प्रभावित न हों। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही 10 अरब डॉलर के सरकारी ऋण और निजी निवेश के जरिए एक रणनीतिक भंडार बनाने की घोषणा कर चुके हैं, जिसे इस ब्लॉक की रीढ़ माना जा रहा है।
फिलहाल चीन दुनिया की लगभग 70 प्रतिशत रेयर अर्थ माइनिंग और 90 प्रतिशत प्रोसेसिंग पर नियंत्रण रखता है। ये खनिज स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, जेट इंजन और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों के लिए बेहद अहम हैं। कूटनीतिक तनाव के दौरान चीन कई बार इन खनिजों के निर्यात पर रोक भी लगा चुका है, जिससे वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है।
इस पहल का भारत पर भी अहम असर पड़ सकता है। भारत इस बैठक का हिस्सा रहा और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सम्मेलन में सक्रिय भागीदारी की। भारत में लिथियम और कॉपर के बड़े भंडार मिलने की संभावनाओं के बीच यह ब्लॉक भारत को माइनिंग और प्रोसेसिंग के लिए अमेरिकी तकनीक और निवेश तक पहुंच दिला सकता है। इससे भारत की सेमीकंडक्टर और ईवी योजनाओं में चीन पर निर्भरता कम होगी।
सम्मेलन में अपने संबोधन में जयशंकर ने आपूर्ति शृंखलाओं के अत्यधिक संकेंद्रण से पैदा होने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए संरचित अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़ी ‘फोर्ज’ पहल के प्रति भारत के समर्थन की भी पुष्टि की। जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए सप्लाई चेन के जोखिम को कम करना समय की जरूरत है।
मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से पहले जयशंकर ने कनाडा, सिंगापुर समेत कई देशों के विदेश मंत्रियों से मुलाकात की। इसके अलावा नीदरलैंड्स, इटली, मलेशिया, बहरीन, मंगोलिया, पोलैंड, रोमानिया, इजराइल और उज्बेकिस्तान के प्रतिनिधियों के साथ भी द्विपक्षीय बातचीत हुई।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि यह ट्रेडिंग ब्लॉक जमीन पर उतरता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पहली बार ‘सिंगल सोर्स’ निर्भरता से बाहर निकलकर बहु-देशीय नेटवर्क की ओर बढ़ेगी, जिससे चीन के किसी भी एकतरफा कदम का असर सीमित किया जा सकेगा।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत

