लखनऊ। Lok Sabha Election 2024: वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जोरशोर से उठाया गया पुरानी पेंशन बहाली का मुद्दा, इस बार कितना असर दिखाएगा? यह लाख टके का सवाल सियासी दलों की नींद उड़ाए हुए हैं। वजह बीते विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने इसे मुद्दा बनाया और बैलेट से पड़ने वाले ज्यादातर वोट उसकी झोली में गए। कर्मचारियों की नाराज़गी को भांपने के बाद ही हालांकि केंद्र की भाजपा सरकार ने पुरानी पेंशन बहाली के अध्ययन के लिए कमेटी गठित कर दी है। इस बार लोकसभा चुनावों की शुरुआत के साथ ही कर्मचारी संगठन एक बार फिर लामबंद हो रहे हैं। उनकी मांग आठवें वेतनमान के साथ ही पुरानी पेंशन की हर हाल में बहाली और आउट सोर्सिंग की विदाई पर टिकी हुई हैं। आइए जानें कि क्या यह मांग लोकसभा चुनावों में मुद्दा बन असर डालेगी?
पुरानी पेंशन योजना की बहाली का बड़ा दबाव राजनीतिक दलों पर नजर आ रहा है। इंडिया गठंबधन में सपा व कांग्रेस इसे प्रमुखता से उठाने की तैयारी में हैं। राहुल गांधी कई बार अपनी न्याय यात्रा में इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठा चुके हैं। वहीं भाजपा भी इस मुद्दे से अपने को दूर नहीं कर पा रही है। केंद्र सरकार द्वारा इस पर विचार के लिए बनाई गई कमेटी जो सुझाव व प्रस्ताव मिले हैं, उस पर अध्ययन करने में जुटी है। कुल मिलाकर यह चुनाव कर्मचारियों के नजरिये से आशा की एक किरण के रूप में है। पुरानी पेंशन की बहाली के लिए आंदोलित देशभर के कर्मचारियों की नजरें इस आम चुनाव में राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र पर लगी हैं। काबिलेगौर होगा कि सपा-कांग्रेस के साथ ही बसपा क्या अपने घोषणापत्र में इसे शामिल कर किस तरह की उम्मीद बंधाते हैं और उनके दावे में कितना दम होगा।
कैसे गुजरेगा बुढ़ापे में सुरक्षित जीवन
देश के पांच करोड़ कर्मचारी सीधे-सीधे पुरानी पेंशन की बहाली, 8वें वेतन आयोग का गठन तथा आउटसोर्स कर्मियों की सेवा सुरक्षा की नियमावली पर राजनीतिक दलों का रूझान जानने व भांपने में लगे हैं। कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सरकार रिटायर होने के बाद उनके गुजर-बसर की क्या गारंटी देगी? बेरोजगारी के आलम में स्थितियां ऐसी भी हैं कि सैकड़ों कर्मचारियों के बच्चे उचित रोजगार नहीं पा पाते..। ऐसे में बच्चों का भरण-परोषण के अलावा खुद और पत्नी के उपचार आदि की इंतजाम कहां से और कैसे होगा?
नई पेंशन इतनी ही अच्छी तो जनप्रतिनिधि क्यों नहीं ले रहे
सचिवालय संघ के अध्यक्ष अर्जुन देव भारती कहते हैंः नई पेंशन योजना इतनी ही अच्छी है तो राजनेता इसे खुद क्यों नहीं अपनाते हैं? सांसदों के साथ ही विधायक, विधान परिषद सदस्य सभी के लिए अब भी पुरानी पेंशन योजना ही है। वहीं 30-35 साल सेवा के बाद भी कर्मचारियों को इससे वंचित करने का काम किया गया है। पुरानी पेंशन बहाली हर हाल में होनी चाहिए।
पुरानी पेंशन मुद्दे पर मोदी सरकार ने भी बनाई है समिति
इंडियन पब्लिक सर्विस इंप्लाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीपी मिश्रा कहते हैं कि पश्चिम बंगाल, राजस्थान, केरल, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु की सरकारें अपने कर्मचारियों को पुरानी पेंशन दे रही हैं। लगातार आंदोलनों के बाद पिछले साल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर रिपोर्ट देने के लिए वेतन समिति का गठन किया। कर्मचारी नेताओं से पुरानी पेंशन के मुद्दे पर समिति को बताया गया है कि एनपीएस के तहत सरकारें जो 14 फीसदी अंशदान कर रही है, उतने से ही सरकारें पुरानी पेंशन दे सकती हैं। इसे देने के लिए सरकारों पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं आएगा। इस मुद्दे से सीधे-सीधे देश के करीब पांच करोड़ कर्मचारी जुड़े हैं।
कर्मचारियों के वेतन से काटी गई राशि शेयर बाजार में लगाने का विरोध
राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष हरिकिशोर तिवारी इस समय भाजपा के नेता बन गए हैं। 2022 विधानसभा चुनाव के समय सपा में थे। सपा के चुनावी एजेंडे में पुरानी पेंशन बहाली को शामिल कराने में इनकी बड़ी भूमिका थी। वह बताते हैं कि भारत सरकार द्वारा पुरानी पेंशन बहाली के मुद्दे पर बनाई गई कमेटी तेजी से अपना काम कर रही है। बीते 14 मार्च को इस कमेटी की अहम बैठक भी हुई है। यूपी के पूर्व उप मुख्यमंत्री राज्यसभा सांसद डा. दिनेश शर्मा को भी इस कमेटी में अहम जिम्मेदारी मिली है। हरिकिशोर का कहना है कि नई पेंशन योजना में कर्मचारियों का पेंशन फंड शेयर बाजार में लगाए जाने का हर स्तर पर विरोध होगा।
2005 से लागू है नई पेंशन योजना
उत्तर प्रदेश के नजरिये से देखें तो यहां 2005 में पुरानी पेंशन बंद कर दी गई थी। इसके बाद से सरकारी सेवा में आए सभी कर्मचारी नई पेंशन योजना (एनपीए) से आच्छादित हैं। यूपी में मौजूदा समय में करीब 28 लाख कर्मचारी, शिक्षक और पेंशनर सीधे-सीधे इस मुद्दे से जुड़े हुए हैं। समाज में वैचारिक माहौल बनाने वाला यह शिक्षित वर्ग है। यूपी के इन कार्मिकों व पेंशनरों के परिवार को भी जोड़ लें तो इनसे जुड़े वोटरों की तादाद ही करीब एक करोड़ हो जाएगी।
विधानसभा चुनाव में सपा ने इसे बनाया था मुद्दा
यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे पर बढ़त लेने का काम किया था, इसके बावजूद सपा को सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला। यह बात दीगर है कि यूपी के इस विधानसभा चुनाव में सपा को इसका लाभ मिला अथवा नहीं इसे उसके चुनाव परिणामों से देखा व समझा जा सकता है। सपा की सीटें 2017 में 47 थीं जबकि इसके मुकाबले 2022 में सपा और उसके सहयोगी रालोद व सुभाषपा की सीटें बढ़कर 125 तक पहुंच गई थीं। इसके पीछे माना जा रहा है कि राज्य सरकार के कर्मचारियों का एक धड़ा सपा के साथ खड़ा था। हालांकि इस बढ़त के कई और जातीय समीकरण भी कारण थे।
विधायकों के वेतन-भत्ते में हुई है 926 फीसदी वृद्धि
पचास के दशक में प्रदेश में राज्यकर्मियों व इंटर के शिक्षकों का वेतन करीब 45 रुपये से 55 रुपये के बीच हुआ करता था जो आज बढ़कर 70 हजार के आसपास पहुंच चुका है। इस प्रकार से कर्मचारियों व शिक्षकों के वेतन में करीब 127 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसी प्रकार से विधायकों को वेतन-भत्ते के रूप में 110 से 150 रुपये के आसपास मिलता था जो आज बढ़कर 1.25 लाख हो गया है। इसमें वेतन 25 हजार है। इस प्रकार से विधायकों के वेतन भत्ते में एक अनुमान के मुताबिक करीब 926 गुना की वृद्धि हुई है।
2024-25 में पेंशन के मद में 86487 करोड़ का प्राविधान है
वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रदेश सरकार ने करीब 12 लाख पुरानी पेंशन योजना से आच्छादित पेंशनर्स, पारिवारिक पेंशनर्स के लिए बजट में करीब 86487 करोड़ रुपये का प्राविधान किया है। इस प्रकार हर महीने यूपी सरकार पर पेंशन देने के लिए करीब 7207 करोड़ रुपये का खर्च आ रहा है। यूपी में करीब आठ से दस लाख कर्मचारी नई पेंशन स्कीम (एनपीएस) से आच्छादित हैं। इन कर्मचारियों की वेतन से कटने वाली पेंशन की राशि से इतर 14 फीसदी का अंशदान राज्य सरकार करती है। पुरानी पेंशन में पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल होने पर इन कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने पर पेंशन का भार हर महीने सरकार में आएगा। पेंशनर्स की संख्या साल 10 साल बढ़ने पर बजट में इसका भार भी बढ़ता जाएगा।













देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
