Bhojshala Verdict: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने लंबे समय से चले आ रहे धार के भोजशाला परिसर विवाद में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि भोजशाला मंदिर है। हाई कोर्ट ने कमाल मौला मस्जिद परिसर को देवी सरस्वती का मंदिर बताया है। अदालत ने हिंदू पक्ष के पक्ष में फैसला लिया। कहा कि यह स्थल राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था और यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार को लंदन संग्रहालय से मां सरस्वती की प्रतिमा वापस लाने की मांग पर विचार करने की भी अनुमति दी है।
हाई कोर्ट की इस अहम टिप्पणी और फैसले के बाद भोजशाला विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है। अदालत ने एएसआई की 2003 की उस व्यवस्था को भी आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसमें हिंदुओं के पूजा अधिकार सीमित किए गए थे जबकि मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई थी।
भोजशाला पर हाई कोर्ट के फैसले की पांच प्रमुख टिप्पणी-
राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा का केंद्र
हाई कोर्ट की पीठ ने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह स्पष्ट होता है कि विवादित परिसर भोजशाला था, जो परमार वंश के राजा भोज के समय संस्कृत शिक्षा का बड़ा केंद्र हुआ करता था। अदालत ने कहा कि यहां हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य और प्रशासन का संवैधानिक दायित्व है कि श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और स्थल की पवित्रता तथा देवी के स्वरूप का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
पीठ ने कहा, “ऐतिहासिक साहित्य और उपलब्ध अभिलेख यह स्थापित करते हैं कि विवादित स्थल भोजशाला था, जो राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र था। यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी खत्म नहीं हुई।”
कोर्ट बोला- धार्मिक स्वरूप सरस्वती मंदिर
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि भोजशाला- कमाल मौला परिसर एक संरक्षित स्मारक है, लेकिन इसका धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर का है।
कोर्ट की इस टिप्पणी को हिंदू पक्ष के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है। लंबे समय से हिंदू संगठन यह दावा करते रहे हैं कि यह मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर और शिक्षा केंद्र था।
हिंदू करेंगे पूजा, नमाज पर रोक
फैसले का सबसे अहम हिस्सा वह रहा जिसमें अदालत ने एएसआई के 2003 के आदेश के कुछ हिस्सों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वह आदेश, जिसमें हिंदुओं के पूजा अधिकार सीमित किए गए थे और मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी, अब निरस्त किया जाता है।
अदालत ने कहा, “2003 का एएसआई आदेश, जिस हद तक वह हिंदुओं के पूजा अधिकारों को सीमित करता है और मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति देता है, रद्द किया जाता है।” इस आदेश के बाद अब परिसर में हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार मिलेगा।
एएसआई के पास रहेगा संरक्षण और नियंत्रण
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसआई को निर्देश दिया कि भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षा गतिविधियों के प्रबंधन को लेकर उचित निर्णय लिया जाए। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्मारक के संरक्षण और देखरेख का पूरा अधिकार एएसआई के पास ही रहेगा। कोर्ट ने कहा, “केंद्र सरकार और एएसआई भोजशाला मंदिर तथा संस्कृत अध्ययन गतिविधियों के प्रशासन और प्रबंधन को लेकर निर्णय लें। एएसआई परिसर के संरक्षण और देखरेख पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखेगा।”
लंदन से वापस लाई जाएगी मां सरस्वती की प्रतिमा
मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने लंदन के एक संग्रहालय में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग भी उठाई। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने पहले ही केंद्र सरकार को कई ज्ञापन दिए हैं और सरकार इस मांग पर विचार कर सकती है। अदालत ने कहा, “याचिकाकर्ताओं ने देवी सरस्वती की प्रतिमा को लंदन संग्रहालय से वापस लाने के लिए कई प्रस्तुतियां दी हैं। केंद्र सरकार इन मांगों पर विचार कर सकती है।”
क्या है भोजशाला विवाद?
मध्य प्रदेश धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। वर्षों से यहां पूजा और नमाज को लेकर विशेष व्यवस्था लागू थी। मंगलवार को हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी जाती थी जबकि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करता था।













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