आज का दिन आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। पौष मास की मासिक शिवरात्रि न केवल कैलेंडर की एक तिथि है, बल्कि यह आत्मचिंतन, साधना और शिव-तत्त्व से जुड़ने का एक गहन अवसर है। शीत ऋतु की निस्तब्धता में जब प्रकृति स्वयं ध्यानमग्न प्रतीत होती है, तब शिवरात्रि का यह पर्व मनुष्य को भीतर की यात्रा का निमंत्रण देता है।
शिव—जिन्हें संहारक कहा जाता है—वास्तव में विनाश नहीं, बल्कि परिवर्तन के देवता हैं। वे अहंकार, अज्ञान और जड़ता के संहारक हैं। पौष मास की ठंडी रातें, धैर्य और तप की परीक्षा लेती हैं, और यही कारण है कि इस मास की शिवरात्रि को विशेष फलदायी माना गया है। यह रात जागरण की है—केवल नेत्रों के जागरण की नहीं, बल्कि चेतना के जागरण की।
मासिक शिवरात्रि पर शिवलिंग का अभिषेक, ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप और रुद्राभिषेक जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित करते हुए भक्त अपने भीतर की अशुद्धियों को भी शिव के चरणों में समर्पित करता है। यह समर्पण ही शिव-भक्ति का मूल है—जहाँ अपेक्षा नहीं, केवल श्रद्धा होती है।
पौष मास की शिवरात्रि यह भी स्मरण कराती है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के हृदय में वास करते हैं। जब मन शांत होता है, जब क्रोध शिथिल पड़ता है और जब अहंकार गलकर करुणा बन जाता है—तभी शिव का साक्षात्कार होता है।
आज की मासिक शिवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि जीवन की अंधेरी रातों में भी एक दिव्य प्रकाश संभव है। आवश्यकता है तो केवल भीतर के शिव को पहचानने की—क्योंकि जहाँ चेतना है, वहीं शिव है।
हर हर महादेव।













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