डेस्क : बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव इस समय सबसे चर्चित मुकाबलों में गिना जा रहा है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के चुनावी मैदान में उतरने की अटकलों ने इस सीट को राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल राजनीतिक लड़ाई बना दिया है। हालांकि उनकी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है, लेकिन पार्टी नेताओं के संकेतों ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है।
बांकीपुर सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाती है। पिछले करीब तीन दशकों से इस सीट पर भाजपा का दबदबा कायम है। हाल ही में पूर्व विधायक नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई, जिसके चलते उपचुनाव कराया जा रहा है। चुनाव आयोग ने 30 जुलाई को मतदान की तारीख तय की है।
प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा माना जा रहा है। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी और करगहर जैसे चर्चित मुकाबले में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में बांकीपुर उपचुनाव को उनके राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला चुनाव माना जा रहा है।
जन सुराज का दावा है कि वह इस चुनाव को केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि इसे राज्य सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह के रूप में पेश करेगी। स्वयं प्रशांत किशोर पहले भी कह चुके हैं कि बांकीपुर का परिणाम बिहार की मौजूदा सरकार के प्रदर्शन पर जनता की राय को सामने लाएगा।
दूसरी ओर भाजपा इस सीट को किसी भी कीमत पर अपने कब्जे में बनाए रखना चाहती है। पार्टी सामाजिक समीकरणों और स्थानीय संगठनात्मक मजबूती के आधार पर रणनीति तैयार कर रही है। संभावित उम्मीदवारों को लेकर भी कई नाम चर्चा में हैं और भाजपा इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर इस सीट पर मजबूत प्रदर्शन करते हैं तो जन सुराज को नई राजनीतिक ऊर्जा मिल सकती है। वहीं कमजोर प्रदर्शन या हार की स्थिति में उनकी राजनीतिक रणनीति और जनाधार को लेकर फिर सवाल उठ सकते हैं। इसी कारण बांकीपुर उपचुनाव को बिहार की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण उपचुनाव माना जा रहा है।













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