लाडनूं : वर्तमान समय में मानूसन पूरे भारत में सक्रिय नजर आ रहा है। कहीं बहुत तीव्र वृष्टि तो कहीं-कहीं अल्पवृष्टि की स्थिति बनी हुई है। राजस्थान में भी अभी तक जहां तेज रेत भरे आंधी-तूफान आते थे, अब वहां वर्षा ने अपना प्रभाव जमा लिया है। यह बरसात पूरे देश के किसानों को कृषि कार्य के लिए मानों अभिप्रेरित कर रही है। देश भर में किसान अपनी-अपनी भौगोलिक संरचना के अनुसार फसलों के उत्पादन के लिए खेतों को बनाने और उसमें फसलों के लगाने का कार्य प्रारम्भ भी कर दिया है। वहीं वर्तमान समय में राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती के भव्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान कर रहे हैं।
मौनसूनी बरसात के कारण युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए सुधर्मा सभा में नहीं पधार पाए तो आचार्यश्री ने जनता को अपने प्रवास स्थल से ही मंगल प्रतिबोध प्रदान कर कृतार्थ किया। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘विद्या और आचार के पारगामी आचार्य कुमार श्रमण केशी’ को आगम माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि जम्बूद्वीप के इस भरतक क्षेत्र में इस अवसर्पिणी काल में चौबीस तीर्थंकर हो चुके हैं। अब कोई तीर्थंकर वर्तमान में नहीं होने वाले। इसलिए वर्तमान में तीर्थंकरों का अभाव है। इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर हुए। उनसे पूर्ववर्ती अर्थात तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ हुए। वे वीतराग थे, उनका नाम पार्श्व था। वे लोकपूजित थे। उनको पुरुषादानीय विशेषण का भी उपयोग किया गया। यह विशेषण उनकी लोकप्रियता का द्योतक हो सकता है। सबसे अधिक स्तोत्र, मंत्र आदि भी भगवान पार्श्व के संदर्भ में प्राप्त है, उतना अन्य तीर्थंकरों के संदर्भ में नहीं प्राप्त है। वे धर्म तीर्थंकर थे। भगवान महावीर के समय भी भगवान पार्श्वनाथ के परंपरा के शिष्य थे। आगमों में ऐसे प्रसंग भी प्राप्त होते हैं। वे दुनिया के दीपक के प्रकाश देने वाले प्रदीप थे। वे लोक के दीपक थे। उनकी शिष्य संपदा भी थी। उनके एक शिष्य भी महायशस्वी थे, जिनका नाम था-केशी कुमार श्रमण।
अविवाहित अवस्था में उन्होंने दीक्षा स्वीकार की थी। वे चौथे पट्टधर आचार्य थे। वे विद्या में पारगामी और आचार में भी पारगामी थे। विद्या, ज्ञान में पारंगत होना विशेष बात होती है। बड़े महिमावान संत थे। वे चरित्रवान और सिद्धांत ज्ञाता थे। उनके जीवन की इस विशेषता को समझने का प्रयास करें। जिसका चारित्र अच्छा होता है, उनकी मुक्ति सुनिश्चित होती है। दो ज्ञानी आपस में मिलते हैं तो कितनी ज्ञान की चर्चाएं होती हैं। उस चर्चा को सुनने का अवसर मिले तो लोगों के ज्ञान का कितना विकास हो सकता है।
आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। यह जिज्ञासा का क्रम मानों ज्ञान को पुष्ट बनाने वाले सिद्ध हो रहे हैं। आचार्यश्री ने तेरापंथ दर्शन और भिक्षु विचार दर्शन पुस्तकों द्वारा इस योगक्षेम वर्ष में अच्छा अध्ययन कर ज्ञानात्मक विकास करने की प्रेरणा प्रदान की।













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