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निरहंकारिता से होता है उच्च गोत्र कर्म का बंध : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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Home आराधना-साधना

निरहंकारिता से होता है उच्च गोत्र कर्म का बंध : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
August 3, 2023
in आराधना-साधना
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निरहंकारिता से होता है उच्च गोत्र कर्म का बंध : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

मुंबई:मानसून आने के बाद से मानों मुम्बई में सूर्य का दर्शन ही दुर्लभ-सा हो गया है। यदा-कदा सूर्य निकलता भी है तो कुछ ही क्षणों के बाद आसमान में छाए बादल उसे ढंक देते हैं, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के आध्यात्मिक आलोक से पूरी मुम्बई प्रकाशित हो रही है। इस आलोक से जन-जन के मानस में आध्यात्म का उजाला अपना स्थान बना रहा है जो लोगों को जीवन का सही पथ प्रदर्शित करने में सहायक सिद्ध हो रहा है। नित्य प्रति सैंकड़ों की संख्या में मुम्बईवासी श्रद्धालु मुम्बई-सूरत एक्सप्रेस हाइवे के निकट बने नन्दनवन में पहुंचते हैं तथा गुरुवाणी का श्रवण करने के साथ ही चारित्रात्माओं के दर्शन-सेवा का लाभ भी प्राप्त करते हैं।

गुरुवार को तीर्थंकर समवसरण से तीर्थंकर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भगवती सूत्र आगम के माध्यम से श्रद्धालुओं को उद्बोधित करते हुए कहा कि आठ कर्मों में सातवां है गोत्र कर्म बंध। गोत्र कर्म बंध पुण्य और पाप दोनों रूपों में होता है। गोत्र कर्म दो प्रकार के होते हैं- उच्च गोत्र कर्म और नीच गोत्र कर्म। जाति, बल, रूप, लाभ, श्रुत, एश्वर्य आदि का मद न करने वाले अर्थात निरहंकार रहने वाले को उच्च गोत्र कर्म का बंध होता है और उपरोक्त सभी का अहंकार करने वाले को नीच गोत्र कर्म का बंध होता है।
आदमी को अपने जीवन में किसी भी प्रकार के घमण्ड से बचने का प्रयास करना चाहिए। उच्च गोत्र कर्म बंध के उदय से आदमी को अच्छा कुल प्राप्त हो सकता है। आदमी को अपने कुल का अहंकार नहीं करना चाहिए। वर्तमान समय में जातिगत व्यवस्थाएं भलें हों, लेकिन इस लोकतांत्रिक प्रणाली में जाति का महत्त्व नहीं है। इसलिए आदमी को अपनी जाति का भी अहंकार करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। अध्यात्म में उन्नयन के लिए अहंकार त्याज्य होता है। कोई-कोई आदमी को शारीरिक बल की बहुत अच्छी प्राप्ति होती है। कितना भी श्रम कर सकता है, बहुत वजन उठा सकता है, बिना थके कार्य कर सकता है तो ऐसी स्थिति में भी आदमी को अपने बल का अहंकार नहीं करना चाहिए। किसी को सुन्दर चेहरा मिल जाए, अच्छी काया मिल जाए तो उसे उसके घमण्ड से बचने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में रूप का अपना कुछ महत्त्व हो सकता है, किन्तु रूप से ज्यादा गुणों का, आचरणों का, व्यवहार का, ज्ञान का महत्त्व होता है। इसलिए आदमी को रूप के अहंकार से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या करनी अच्छी बात है, लेकिन तपस्या के अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए। किसी कार्य में उसे विशेष लाभ हो रहा हो, धन की मानों बरसात हो रही हो, तब भी आदमी को समता भाव में रहने का प्रयास करना चाहिए और धन के घमण्ड से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञानावरणीय कर्म के अच्छे क्षयोपशम से अच्छा ज्ञान प्राप्त है तो आदमी को ज्ञान के भी अहंकार से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार जीवन में जितनी निरहंकारता रहेगी, उच्च गोत्र कर्म का बंध होगा और नीच गोत्र कर्म बंध से बचाव हो सकता है।
निरहंकारिता वर्तमान जीवन को भी अच्छा बनाने में सहायक हो सकता है। गृहस्थ जीवन में अहंकार न हो तो उसकी प्रतिष्ठा, मान, सम्मान आदि की वृद्धि हो सकती है। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त कालूयशोविलास की आख्यानमाला के क्रम को आगे बढ़ाते हुए मालवा प्रदेश की यात्रा के दौरान जावरा में हुए विरोध आदि के प्रसंगों का भी सरसशैली में वाचन करते हुए लोगों को अभिप्रेरित किया। साध्वीवर्याजी ने भी जनता को उद्बोधित किया। सेना में कर्नल श्री उदयकुमार ने आचार्यश्री के दर्शन कर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया। कई तपस्वियों ने अपनी-अपनी तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया।
मुनि दिनेशकुमारजी ने फरमाया कि देवलोक में सभी सर्वोच्च स्तुति के देव होते है, उनके अंदर ऊंच नीच की भावना नहीं होती हे और उनमें स्वामीसेवक का भेद नही होता है । 12 वें देवलोक मे सभी देवी देवता अपने अग्निज्ञान से पूर्व ज्ञान द्वारा सब जान लेते है। आगम में बताया गया है की इंद्रो द्वारा की गई स्तुति में सरकस स्तुति द्वारा से तीर्थंकर, आचार्य की भी स्तुति होती है । स्तवन स्तुति करने से बोधी लाभ होता है जिससे आत्मकल्याण में आगे बढ़ जाते है, स्तुति तब ही होती हे जब अंदर की भावना भी होनी चाहिए । समता की साधना में रहने से स्तवन स्तुति के योग्य होते है ,और उनके ज्ञान का मार्ग अच्छी तरह से प्रशस्त होता है । जयाचार्य – ज्यारो ध्यान धरूं, मंत्रक्षर नाम तुम्हारो। भिक्षु भारी रायमल ज्यारों ध्यान धरूं, अंतरमन में भिक्षु तुम्हारो ध्यान धरूं ।
ज्ञानशाला में तत्व ज्ञान का मार्ग अच्छा प्रशस्त होता है । हर परिवार में शनिवार की सामूहिक रूप से सामायिक करने से परिवार में संस्कारों की वृद्धि होगी । मुनि सुव्रत स्वामी और अरिष्टनेमी तीर्थंकर का जन्म हरिशंकर के वंश में हुआ था।
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