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Home आराधना-साधना

रहो भीतर, जीओ बाहर: समत्व योगी आचार्य महाश्रमण

15 दिवसीय हरियाणा प्रवास के उपरान्त महातपस्वी ने किया राजस्थान में मंगल प्रवेश

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
April 15, 2022
in आराधना-साधना
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रहो भीतर, जीओ बाहर: समत्व योगी आचार्य महाश्रमण

लासेड़ी, चूरु:सात वर्ष से अधिक समय तक भारत के बीस राज्यों व दो पड़ोसी देशों नेपाल व भूटान की राष्ट्र प्रभावक अहिंसा यात्रा का दिल्ली में भव्य समापन करने के उपरान्त हरियाणा जिले में कुल पन्द्रह दिवसीय प्रवास व विहरण करने के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को राजस्थान की सीमा में मंगल प्रवेश किया। अब आचार्यश्री राजस्थान में वर्ष 2022 के चतुर्मास सहित लगभग आठ महिनों तक राजस्थान की धरा पर ज्ञान की गंगा बहाएंगे।

शुक्रवार को प्रातः आचार्यश्री ने हरियाणा राज्य के भिवानी जिले के मोतीपुरा गांव से मंगल प्रस्थान किया। मोतीपुरा के ग्रामीणों ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्यश्री का आज का विहार राजस्थान की ओर था। गर्म प्रदेश के रूप में विख्यात राजस्थान में गर्मी के दिनों में आचार्यश्री का प्रवेश, प्रवास और विहार भले ही अन्य लोगों के लिए कठिनाइयों से भरा होने वाला लग रहा हो, किन्तु समता के साधक आचार्यश्री के लिए प्राकृतिक अनुकूलता व प्रतिकूलता कभी बाधक ही नहीं बन पाई। दृढ़ संकल्पी आचार्यश्री ने कुछ किलोमीटर के विहार के बाद ही हरियाणा से राजस्थान में मंगल प्रवेश किया। इस अवसर पर हरियाणावासी अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे तो राजस्थानवासी अपने आराध्य का अभिनंदन कर रहे थे। तपती गर्मी में आचार्यश्री ने लगभग 15 किलोमीटर का विहार कर राजस्थान के चूरु जिले के लसेड़ी गांव स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।

विद्यालय प्रांगण के उपस्थित जनता को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि मनुष्य के भीतर कभी आसक्ति का भाव आ जाता है तो कभी अनासक्ति का भाव भी आता है। साधना के लिए महत्त्वपूर्ण सूत्र है-अनासक्त रहो। कार्य, पदार्थ संसार, परिवार के प्रति अनासक्त रहोे। उससे भी ऊंची बात हो सकती है कि आदमी अपने शरीर के प्रति भी अनासक्त रहे। शरीर को चलाने के लिए भोजन, मकान, कपड़े, दवा आदि साधनों की आवश्यकता होती है और साधनों की उपलब्धता के लिए आदमी को प्रवृत्ति करनी होती है। कर्म करने के बाद भी बन्धन से बचने के लिए अनासक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। कर्म करने के बाद भी उस धायमाता की भांति अनासक्त रहे जो बच्चे का लालन-पालन करने के बाद भी वह मन में यह भाव रखती है कि यह मेरा नहीं है। कहा गया है-रहो भीतर, जीओ बाहर।

ममत्व की भावना ज्यादा नहीं होनी चाहिए। मैं, मेरा जैसी ममत्व की भाषा का जितना कम प्रयोग हो अनासक्ति की साधना हो सकती है। हमारे धर्मसंघ में ममत्व की भावना को दूर रखने का प्रयास किया गया है। हमारे यहां किसी के शिष्य, शिष्या नहीं हो सकते। इससे साधु के अवांछनीय मोह नहीं हो सकता। पद के उम्मीदवार बनने की व्यवस्था भी नहीं है। मन में अनासक्ति की भावना के बाद यदि कोरी प्रवृत्ति होती है तो कर्म का सघन बन्धन नहीं होता। इस अनासक्ति की साधना करने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन करते हुए साधु-साध्वियों को अनेक प्रेरणाएं प्रदान कीं। तदुपरान्त आचार्यश्री की आज्ञा से बालमुनि रत्नेशकुमारजी, ऋषिकुमारजी, खुशकुमारजी व अर्हम्कुमारजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने बालमुनियों को दो-दो कल्याणक बक्सीस की। आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज से एक महीना पहले दिल्ली में शासनमाता साध्वीप्रमुखाश्रीजी का महाप्रयाण हो गया। आज उनकी प्रथम मासिक पुण्यतिथि है। उन्होंने तीन-तीन आचार्यों के समय मंे साध्वीप्रमुखा के रूप में कार्य किया। मैंने उनकी समाधि स्थल को वात्सल्य पीठ नाम प्रदान किया है। आज मैं उनका जप करने के लिए ‘ऊँ हृीं श्रीं क्लीं शासनमात्रे नमः’ मंत्र की स्थापना करता हूं। आचार्यश्री ने खड़े होकर मंत्र की स्थापना करने के उपरान्त कुछ समय तक चतुर्विध धर्मसंघ के साथ उक्त मंत्र का जप भी किया। आचार्यश्री ने शासनमाता का स्मरण करते हुए उनकी आत्मा की परम शांति व मोक्षश्री के वरण की मंगलकामना की।

इस अवसर पर मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने शासनमाता के प्रति अपनी अभिव्यक्ति के साथ स्वरचित गीत का भी संगान किया। मुख्यनियोजिका साध्वी विश्रुतविभाजी तथा साध्वीवर्या साध्वी संबुद्धयशाजी ने भी शासनमाता के प्रति हृदयोद्गार व्यक्त किए। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रिंसिपल श्रीमती सुनीता पुनिया ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया।

आचार्यश्री ने सान्ध्यकालीन विहार के दौरान लासेड़ी से लगभग सात किलोमीटर का विहार कर राजगढ़ के बाहरी भाग में स्थित आइ.एस. एकेडमी परिसर में पधारे। आचार्यश्री का रात्रिकालीन प्रवास इसी परिसर में हुआ।

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