लाडनूं : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के योगक्षेम वर्ष प्रवास के मंगल आयोजनों से निरंतर गुंजायमान है। परमपूज्य गुरुदेव के जन्मोत्सव एवं पट्टोत्सव पश्चात कल दिनांक 30 अप्रैल को आचार्य प्रवर का 53 वां दीक्षा दिवस ‘युवा दिवस’ के रूप में समायोजित होने वाला है। इस अवसर पर अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा दो दिवसीय दक्षिणांचल कार्यशाला आयोजित है, जिसमें बड़ी संख्या में युवक देश भर से सम्मिलित होने हेतु उपस्थित है। गुरुदेव की सन्निधि में आज तेरापंथ धर्मसंघ के आद्यप्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु की मासिक पुण्यतिथि शुक्ला तेरस भी मनाई गई। इसके साथ की चारित्र आत्माओं द्वारा अभिवंदना का क्रम भी जारी रहा।
भिक्षु चेतना वर्ष एवं आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत शुक्ल त्रयोदशी के पावन अवसर पर, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने ‘पुण्य बंध: एक विश्लेषण’ विषय पर तात्विक मीमांसा प्रस्तुत करते हुए नव तत्वों के संदर्भ में कहा कि पुण्य और पाप को अजीव पुद्गल की श्रेणी में रखा गया है, फिर भी ये पुद्गल अजीव होकर भी जीव आत्मा से गहराई से जुड़े होते हैं। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय जैसे एकांत पाप कर्मों के कारण लगभग 75 प्रतिशत कर्म पाप के खाते में जाते हैं, जबकि वेदनीय, आयुष्य, नाम और गोत्र कर्मों के शुभ योग से शेष पच्चीस प्रतिशत पुण्य के अंतर्गत आते हैं। इसी पुण्य के उदय से जीव को सांसारिक जीवन में निरोगता, सुख-समृद्धि और अनुकूल स्थितियां प्राप्त होती हैं। आत्म-कल्याणकारी साधक का मुख्य लक्ष्य सदैव कर्मों की निर्जरा करना ही होना चाहिए।
आचार्य श्री ने आगे फरमाया कि इस संदर्भ में मुख्य रूप से दो विचारधाराएं प्रचलित हैं। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ की यह स्पष्ट मान्यता है कि पुण्य का बंध सदैव निर्जरा के साथ ही होता है, स्वतंत्र रूप से पुण्य का बंध नहीं होता। गुरुदेव ने अन्य आम्नायों द्वारा स्वतंत्र पुण्य बंध को स्वीकार करने के दो प्रमुख तार्किक कारण बताए। पहला कारण यह है कि तेरापंथ परंपरा मिथ्यात्वी की अच्छी करणी में भी धर्म यानी सकाम निर्जरा मान लेती है, इसलिए हमें स्वतंत्र पुण्य मानने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, परंतु जो आम्नाय मिथ्यात्वी की करणी में धर्म नहीं मानते, उन्हें उसकी ऊर्ध्व गति अच्छी गति को सिद्ध करने के लिए विवश होकर स्वतंत्र पुण्य बंध मानना पड़ता है। गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि साधक की साधना में कभी निर्जरा अधिक और पुण्य कम, तो कभी पुण्य अधिक और निर्जरा कम हो सकती है, किंतु चौदहवें गुणस्थान और मोक्ष की अवस्था तक पहुँचने के लिए अंततः इन पुण्य कर्मों को भी पूरी तरह से झड़ना ही पड़ता है।
कार्यक्रम में भावभीव्यक्ति के क्रम में मुनि कौशल कुमार जी, साध्वी शालीन प्रभा जी, साध्वी कल्पमाला जी, साध्वी समत्वप्रभा जी, मुनि सिद्ध कुमार जी, मुनि चिन्मय कुमार जी, साध्वी मंदारयशा जी, साध्वी आर्यप्रभा जी, साध्वी रत्नप्रभा जी, मुनि प्रिंस कुमार जी, समणी मृदु प्रज्ञा जी, समणी स्वर्ण प्रज्ञा जी, मुनि अर्हम कुमार जी, साध्वी मधुयशा जी, साध्वी शांतिलता जी, साध्वी कमलप्रभा जी, मुनि केसी कुमार जी, साध्वी मुकुल यशा जी, साध्वी संकल्पश्री जी, साध्वी मधुलता जी, साध्वी प्रांशुप्रभा जी, साध्वी मौलिकयशा जी, साध्वी सिद्धांतप्रभा जी, साध्वी दर्शितप्रभा जी, साध्वी मयंकप्रभा जी सहित कई चारित्र आत्माओं ने अपने गीत एवं वक्तव्य द्वारा आराध्य की अभिवंदना की। कई साध्वी वृंद ने सामूहिक रूप में भी प्रस्तुति दी।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत
