जयपुर : मानसरोवर स्थित रघुविहार के अतुल्य हाइट्स में ‘विवेक’ विषय पर आयोजित प्रवचन सभा में आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि साधु का विवेक उच्च कोटि का होता है। साधु अपने उपदेश के माध्यम से दूसरों में विवेक जागृत करने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि सामान्यतः वही व्यक्ति दूसरों को उपदेश देने का अधिकारी होता है, जो स्वयं उस आचरण का पालन करता हो। ‘निज पर शासन, फिर अनुशासन’ की भावना ही समाज में सार्थक परिवर्तन का आधार बन सकती है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि संत सदैव शांति के साधक और संदेशवाहक होते हैं। उनसे समाज को प्रेम, भाईचारा, शांति, सौहार्द, मैत्री, करुणा और सद्भावना का संदेश प्राप्त होता है। घृणा, वैर, विरोध या परस्पर वैमनस्य फैलाना संतों का कार्य नहीं होता।
सभा में उपस्थित आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री संभव कुमार जी ने भी साधु की चर्या पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साधु जीवन विवेकपूर्ण आचरण पर आधारित होता है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने ढाई हजार वर्ष पूर्व जो साधु चर्या निर्धारित की थी, वह आज भी विज्ञान सम्मत मानी जाती है और देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुरूप प्रासंगिक है।
मुनि श्री ने आगम शास्त्रों का उल्लेख करते हुए बताया कि यदि भिक्षा के समय किसी मुनि को शारीरिक आवश्यकता उत्पन्न हो जाए तो उसे रोकना उचित नहीं है, बल्कि उचित स्थान पर उसका विसर्जन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान भी शारीरिक आवश्यकताओं को रोकने को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भगवान महावीर ने साधु-संतों के लिए व्यवहारिक निर्देश दिए थे, जिनमें परिस्थितियों के अनुसार आचरण की अनुमति भी शामिल है। यदि उपयुक्त स्थान उपलब्ध न हो तो परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है, परंतु धर्म की मूल भावना और अनुशासन का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि वर्तमान परिस्थितियों में राज्य के निर्देशों का पालन और धार्मिक आचरण के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए, जिससे धर्म की प्रभावना बनी रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर मल्लि प्रभु की स्तुति से किया गया। इस अवसर पर प्रेक्षाध्यान के प्रयोग भी कराए गए। अंत में मंगल पाठ के साथ सभा का समापन हुआ।













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