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Home आराधना-साधना

शिक्षा के बाधक तत्त्वों को दूर कर करें बाहुश्रुत्य की आराधना : महातपस्वी महाश्रमण

आचार्यश्री ने ‘शिक्षा के बाधक तत्त्वों’ को किया व्याख्यायित 

ON THE DOT TEAM by ON THE DOT TEAM
May 7, 2026
in आराधना-साधना
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शिक्षा के बाधक तत्त्वों को दूर कर करें बाहुश्रुत्य की आराधना : महातपस्वी महाश्रमण
लाडनूं :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘शिक्षा के बाधक तत्त्व’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि श्रुत का भी अपना महत्त्व है। एक अल्पश्रुत होता है और एक बहुश्रुत होता है। अल्पश्रुत अर्थात् कम ज्ञान रखने वाला और बहुत ज्ञानी आदमी बहुश्रुत होता है। जो शास्त्रज्ञ हो, जो शास्त्रों की गहराई में पैठने वाला हो, ऐसा व्यक्ति बहुश्रुत बन सकता है। श्रुत की आराधना बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।
श्रुत की आराधना करने वाले मानों जिनेश्वर भगवान की आराधना करने वाले होते हैं। बारह प्रकार के बताए गए तपों में स्वाध्याय के समान कोई तप नहीं है और न ही होगा। स्वाध्याय के समान कोई तप ही नहीं है। इसलिए स्वाध्याय का बहुत महत्त्व है। आदमी को निरंतर ज्ञान का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री भिक्षु से भी निवेदन किया गया कि आप केवल तपस्या आदि में लग जाएंगे तो लोगों को बताने और समझाने तथा नियमों का प्रतिपादन कैसे हो सकेगा। यह श्रुत का महत्त्व है कि ज्ञान ग्रहण करना और ज्ञान प्रदान करना। इस प्रकार ज्ञान की आराधना को अविरल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
श्रुत की प्राप्ति के लिए पहले अध्ययन किया जाए, प्रतिभा, प्रज्ञा हो तो कोई बाद में बहुश्रुत भी बन सकता है। पढ़ाने वाला अच्छा हो तो पढ़ने वाला भी अच्छा होना चाहिए। ज्ञान को विनम्र भाव से ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। योगक्षेम वर्ष चल रहा है। यहां भी मानों ज्ञान के विकास का विशेष प्रयास होना चाहिए, हो भी रहा है। जो ज्ञानी हैं, वे शैक्ष साधु-साध्वियों समणियों आदि को पढ़ाएं, ज्ञान दें। सबके ज्ञान का विकास हो। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी को देखें तो उनका बाहुश्रुत्य तो हम सभी ने देखा है। आगम संपदा में उनका कितना-कितना श्रम लगा। मुनिश्री बुद्धमलजी स्वामी के श्रुत को भी देखा जा सकता है।
आदमी को अध्ययन के लिए परिश्रम करने का प्रयास करना चाहिए। श्रीमज्जयाचार्य कितने बड़े श्रुतधर आचार्य हुए। आचार्यश्री भिक्षु की प्रतिभा, प्रज्ञा थी। इसलिए जितना संभव हो सके, ज्ञान के विकास का प्रयास करना चाहिए। बहुश्रुत होना भी जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है।
शास्त्र में शिक्षा के पांच बाधक तत्त्व बताए गए हैं। इनमें पहला है-अहंकार। ज्ञान प्राप्ति में अहंकार बाधक होता है। शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक के प्रति यदि कोई अविनय का भाव रखता तो उसे ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है? अविनीत को कैसे ज्ञान प्राप्त हो सकता है। विनम्र होने से ज्ञान की प्राप्ति संभव हो सकती है। ज्ञान प्राप्ति में दूसरा बाधक तत्त्व है-क्रोध। क्रोध भी ज्ञान प्राप्ति में बाधक है। ज्ञान प्राप्ति का तीसरा बाधक तत्त्व है- प्रमाद। आदमी जो विभिन्न विषयों में, हास्य, विकथा आदि में लगा रहता है तो उसे भी ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती है। इसलिए प्रमाद भी ज्ञान प्राप्ति में बाधक तत्त्व है। ज्ञान प्राप्ति का चौथा बाधक तत्त्व रोग को बताया गया है। जिसके शरीर में कोई रोग हो गया, कोई कठिनाई हो गई तो उसका ध्यान भला ज्ञान में कितना क्या लग सकेगा। इसलिए रोगी शरीर से भी ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता। आदमी यथासंभव रोगों से बचने का प्रयास करना चाहिए। हालांकि रोग तो कर्मों का योग भी हो सकता है, किन्तु आदमी को अति आहार और अपथ्य खाने से बचने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान प्राप्ति का पांचवां बाधक है-आलस्य। जो आलसी हो, जिसमें पढ़ने के प्रति उत्साह न हो, वह भी ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता। ज्ञान प्राप्ति के इन पांच बाधक तत्त्वों से बचने का प्रयास हो और ज्ञान प्राप्ति में परिश्रम करने तो बाहुश्रुत्य को प्राप्त किया जा सकता है। सफलता का पौधा परिश्रम के जल का सिंचन मांगता है।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन से पूर्व साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की अभ्यर्थना के संदर्भ में मुनि ध्यानमूर्तिजी, साध्वी सुकृतप्रभाजी, साध्वी सम्यक्प्रभाजी, साध्वी मलयप्रभाजी, साध्वी केवलयशाजी, साध्वी तन्मयप्रभाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए अपने आराध्य को वर्धापित किया।
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