हर रविवार की भोर एक मौन संदेश लेकर आती है। आकाश के पूर्वी क्षितिज पर जब सूर्य अपनी पहली किरण बिखेरता है, तब असंख्य लोग जल से भरा कलश लेकर उसकी ओर बढ़ते हैं। दोनों हथेलियों से अर्घ्य अर्पित होता है, मंत्रों का उच्चारण होता है और श्रद्धा से झुका हुआ मस्तक ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह दृश्य भारतीय संस्कृति की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा का एक सुंदर प्रतीक है।
किन्तु एक प्रश्न हमारे भीतर भी उदित होना चाहिए—क्या सूर्य केवल उस जल से प्रसन्न होते हैं जो हमारी हथेलियों से होकर उनकी ओर जाता है, या उस प्रकाश से भी, जो हमारे जीवन से निकलकर समाज तक पहुँचता है?
भारतीय दर्शन में सूर्य केवल एक ग्रह या खगोलीय पिंड नहीं हैं। वे प्रकाश, ऊर्जा, समय, अनुशासन और निरंतर कर्म के जीवंत प्रतीक हैं। वे प्रतिदिन बिना किसी अपेक्षा के उदित होते हैं। न उन्हें सम्मान की आकांक्षा है, न प्रशंसा की आवश्यकता। बादल उन्हें ढँक लें, धूल उनका तेज कम कर दे या संसार उनकी ओर देखे अथवा न देखे—वे अपने कर्तव्य से कभी विमुख नहीं होते।
यही सूर्य का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश है।
हम प्रायः पूजा को कर्म से अलग कर देते हैं। हमें लगता है कि मंदिर जाना, दीप जलाना, व्रत रखना या अर्घ्य देना ही धर्म की पूर्णता है। जबकि भारतीय ऋषियों ने धर्म को केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जीवन को ही साधना बनाया। उनके लिए पूजा का वास्तविक स्वरूप था—सत्य बोलना, कर्तव्य निभाना, परिश्रम करना, करुणा रखना और अपने अस्तित्व से दूसरों के जीवन में आशा का संचार करना।
यदि हम प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देते हैं, लेकिन अपने व्यवहार से किसी के जीवन में अंधकार भरते हैं, तो हमारी पूजा अधूरी रह जाती है। यदि हमारे शब्द किसी का मन तोड़ते हैं, हमारे निर्णय अन्याय को जन्म देते हैं और हमारा स्वार्थ किसी की पीड़ा का कारण बनता है, तो सूर्य की ओर उठे हुए हाथ भी हमारे भीतर के अंधकार को नहीं मिटा सकते।
सूर्य का प्रकाश कभी अपने लिए नहीं होता। वह सबके लिए समान रूप से फैलता है। न वह किसी जाति का भेद करता है, न किसी धर्म का, न किसी संपन्न और निर्धन का। प्रकृति हमें प्रतिदिन समता का यह अद्भुत पाठ पढ़ाती है। यदि हम सचमुच सूर्य उपासक हैं, तो हमें भी अपने व्यवहार में यही उदारता और समानता लानी होगी।
आज का मनुष्य ऊर्जा की कमी से नहीं, दिशा की कमी से अधिक पीड़ित है। ज्ञान के साधन बढ़ गए हैं, लेकिन विवेक कम होता जा रहा है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर संतोष घट गया है। संपर्कों की संख्या बढ़ी है, पर संबंधों की ऊष्मा कम हो गई है। ऐसे समय में सूर्य हमें याद दिलाते हैं कि प्रकाश का अर्थ केवल चमकना नहीं, बल्कि दूसरों को देखने योग्य बनाना भी है।
हमारे घरों में अक्सर यह शिक्षा दी जाती है कि सुबह सूर्य को जल चढ़ाओ। यह परंपरा निश्चय ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बनाती है। किन्तु यदि उसी शिक्षा के साथ यह भी जोड़ दिया जाए कि प्रतिदिन किसी एक व्यक्ति के जीवन में आशा का एक दीप जलाना भी सूर्योपासना का ही भाग है, तो हमारी अगली पीढ़ी केवल धार्मिक नहीं, वास्तव में आध्यात्मिक बनेगी।
सच्चा अर्घ्य जल का नहीं, चरित्र का होता है।
जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है, तब वह सूर्य को अर्घ्य दे रहा होता है। जब कोई चिकित्सक सेवा को व्यवसाय से ऊपर रखता है, तब वह सूर्य की उपासना करता है। जब कोई किसान विपरीत परिस्थितियों में भी धरती को अन्न से भर देता है, जब कोई सैनिक सीमाओं पर जागकर राष्ट्र की रक्षा करता है, जब कोई माँ अपने परिवार के लिए निस्वार्थ समर्पण करती है, तब उनके कर्म ही सूर्य स्तुति बन जाते हैं।
धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को प्रकाशवान बनाना है। ऐसा प्रकाश, जो अहंकार से नहीं, विनम्रता से उत्पन्न हो। ऐसा तेज, जो दूसरों को जलाए नहीं, बल्कि उनके मार्ग को प्रकाशित करे। ऐसा व्यक्तित्व, जिसकी उपस्थिति से निराश व्यक्ति को आशा मिले, भ्रमित व्यक्ति को दिशा मिले और दुखी व्यक्ति को विश्वास मिले।
रविवार केवल विश्राम का दिन नहीं होना चाहिए। यह आत्मचिंतन का भी दिन हो सकता है। सप्ताह भर की दौड़-भाग के बीच एक क्षण ऐसा भी आए जब हम स्वयं से पूछें—क्या मैं केवल सूर्य का प्रकाश देख रहा हूँ, या स्वयं भी किसी के जीवन का प्रकाश बन पा रहा हूँ? क्या मेरी सफलता केवल मेरे लिए है, या उससे समाज का भी कोई हित जुड़ा है? क्या मेरे शब्द लोगों को जोड़ते हैं या तोड़ते हैं? क्या मेरा जीवन केवल उपलब्धियों से भरा है, या उपयोगिता से भी?
आध्यात्म हमें बाहरी संसार से भागना नहीं सिखाता; वह संसार के बीच रहते हुए प्रकाश बनना सिखाता है। जिस प्रकार सूर्य आकाश में रहकर भी पृथ्वी के प्रत्येक जीव को स्पर्श करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने कर्म, अपने विचार और अपने व्यवहार से समाज को आलोकित करना चाहिए।
अगली बार जब आप रविवार की सुबह सूर्य को अर्घ्य देने जाएँ, तो जल के साथ एक संकल्प भी अर्पित कीजिए। संकल्प यह कि आज से आपके कारण किसी का मन अंधकारमय नहीं होगा। आपके शब्दों से किसी को साहस मिलेगा, आपके कर्मों से किसी का विश्वास बढ़ेगा और आपकी उपस्थिति से किसी के जीवन में आशा की एक नई किरण जन्म लेगी।
क्योंकि सूर्य को अर्पित किया गया जल कुछ क्षणों में धरती पर लौट आता है, किन्तु मनुष्य द्वारा फैलाया गया प्रकाश पीढ़ियों तक बना रहता है। वही प्रकाश सबसे श्रेष्ठ पूजा है, वही सबसे बड़ा अर्घ्य है और वही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक जीवन की पहचान है।













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