मुंबई :शिवसेना (यूबीटी) ने अजित पवार के निधन के कुछ ही दिनों बाद सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का दावा है कि यह फैसला पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी की रणनीति का हिस्सा था। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र सामना में प्रकाशित लेख में आरोप लगाया गया है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपा ‘मास्टरमाइंड’ की भूमिका में थी।
सामना में यह भी दावा किया गया है कि भाजपा नेतृत्व के साथ-साथ एनसीपी के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल नहीं चाहते थे कि एनसीपी का दो धड़ों में बंटा संगठन एक बार फिर एकजुट हो। इसी आशंका के चलते जल्दबाजी में राजनीतिक फैसले लिए गए।
गौरतलब है कि 28 जनवरी को एक विमान दुर्घटना में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी नेता अजित पवार का निधन हो गया था। इसके ठीक चार दिन बाद सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें इस शपथ ग्रहण की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी। सामना के अनुसार, सुप्रिया सुले सहित पवार परिवार के किसी भी सदस्य को इस निर्णय की सूचना नहीं दी गई थी। लेख में दावा किया गया है कि सुनेत्रा पवार बिना किसी को बताए बारामती से मुंबई रवाना हो गईं।
12 फरवरी को प्रस्तावित था विलय?
रिपोर्ट के अनुसार, अजित पवार के जीवित रहते ही एनसीपी के दोनों गुटों के एकीकरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। यहां तक कहा जा रहा था कि 12 फरवरी को दोनों दलों के विलय की तारीख तय हो चुकी थी। हालांकि, अजित पवार के निधन के बाद यह प्रक्रिया ठप पड़ती नजर आ रही है और अब कोई भी नेता इस तारीख की पुष्टि करने को तैयार नहीं है।
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया है कि अजित पवार के जाने के बाद एनसीपी में आंतरिक महत्वाकांक्षाएं और तेज हो गईं। पार्टी के भीतर उपमुख्यमंत्री पद को लेकर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई थी। वहीं प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे के बीच भी मतभेद उभरकर सामने आए। ऐसे हालात में, शिवसेना का दावा है कि आनन-फानन में सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया ताकि पवार परिवार की एकता का संदेश दिया जा सके।
शिवसेना (यूबीटी) ने यह भी कहा कि भले ही सुनेत्रा पवार को सत्ता में स्थान मिल गया हो, लेकिन सरकार की ‘स्टीयरिंग’ अब भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हाथों में है। पार्टी के अनुसार, फडणवीस की राजनीतिक कृपा पर ही सुनेत्रा पवार और एकनाथ शिंदे की भूमिका टिकी हुई है।
सामना में यह टिप्पणी भी की गई है कि यह देखना बाकी है कि सुनेत्रा पवार आने वाले दिनों में केवल औपचारिक भूमिका निभाती हैं या सक्रिय राजनीति में मुखर होकर सामने आती हैं। लेख में यह विरोधाभास भी रेखांकित किया गया है कि एक ओर वह ‘सनातनी विचारधारा’ वाली भाजपा के साथ खड़ी नजर आती हैं, वहीं दूसरी ओर अजित पवार की अंतिम क्रियाएं संपन्न होने से पहले ही सक्रिय राजनीति में उतरना पारंपरिक रीति-रिवाजों की अनदेखी के रूप में देखा जा रहा है।













मुख्य समाचार
देश
राज्य-शहर
विदेश
बिजनेस
मनोरंजन
जीवंत

