जयपुर : निर्माण नगर स्थित जनपथ के महाप्रज्ञ इंटरनेशनल स्कूल के नवनिर्मित संबोधि सभागार में आयोजित साप्ताहिक आध्यात्मिक प्रवचन माला के अंतर्गत शनिवार को “कथा सुख-दुःख की” विषय पर गहन चिंतन-मंथन हुआ। यह आध्यात्मिक आयोजन मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ और मुनि श्री संभव कुमार जी के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में धर्म परिषद को संबोधित करते हुए मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि जीवन में सुख और दुःख दोनों का अस्तित्व स्वाभाविक है, ठीक उसी प्रकार जैसे नदी के दो तट और सिक्के के दो पहलू होते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रशंसा सुनना अच्छा लगता है, किंतु निंदा सुनते ही वह विचलित हो जाता है, जो उसकी मानसिक अस्थिरता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति प्रशंसा और सम्मान की अपेक्षा रखता है, वही निंदा और अपमान से निराश होता है। जीवन में केवल सुख की कल्पना संभव नहीं है, क्योंकि दिन के साथ रात और प्रशंसा के साथ निंदा भी जुड़ी होती है। उन्होंने प्रेरक रूप से कहा कि जिसने सम्मान की आकांक्षा नहीं की, उसके लिए अपमान का प्रश्न भी नहीं उठता। इसी प्रकार जिसने जीत की चाह नहीं रखी, उसके लिए हार का भय भी समाप्त हो जाता है।
मुनि श्री ने भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य सुख-दुःख में समभाव स्थापित करना है। समता की स्थिति ही आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है।
इसी क्रम में मुनि श्री संभव कुमार जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जीवन मूलतः सुख और दुःख का मिश्रण है। जो मन को अनुकूल लगे वह सुख और जो प्रतिकूल लगे वह दुःख प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि मन को सुख के क्षण छोटे और दुःख के क्षण लंबे प्रतीत होते हैं, किंतु समता का अभ्यास करने पर दोनों स्थितियाँ समान हो जाती हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर स्तुति के साथ हुआ। इसके पश्चात साधु-संतों ने श्रद्धालुओं को ध्यान और स्वाध्याय के माध्यम से आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने का संदेश दिया। अंत में तप, त्याग और मंगल पाठ के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।
इससे पूर्व शुक्रवार को एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन भी किया गया, जिसमें राजलदेसर निवासी एवं जयपुर प्रवासी श्रीमान कोडामल जी बैद की धर्मपत्नी स्वर्गीय श्रीमती सरोज देवी बैद को समाजजनों एवं परिजनों द्वारा भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर मुनि श्री द्वारा शोक संतप्त परिवार को धैर्य एवं संबल प्रदान करते हुए आत्मिक शांति का संदेश दिया गया।













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