भारत की सांस्कृतिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्माण्ड का प्रथम वास्तुकार, अद्भुत शिल्पकार और दिव्य इंजीनियर माना गया है। ऋग्वेद में उनका वर्णन उस सृष्टिकर्ता के रूप में मिलता है, जिन्होंने देवताओं के दिव्य लोक, रथ, अस्त्र-शस्त्र और भवनों का निर्माण किया।
कन्या संक्रांति के दिन उनका अवतरण हुआ था, और यही दिन विश्वकर्मा जयंती के रूप में मनाया जाता है।
क्यों की जाती है यह पूजा?
मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की आराधना करने से रोज़गार, कारोबार, कला और उद्योग में उन्नति होती है। जो व्यक्ति मेहनत और साधना से अपने औज़ार, मशीन और व्यवसाय को साधता है, उसके लिए यह पर्व विशेष फलदायी माना जाता है। कलाकार, बुनकर, शिल्पकार और व्यापारी विशेष रूप से इस दिन की पूजा करते हैं।
शुभ मुहूर्त
इस वर्ष विश्वकर्मा पूजा का शुभ समय 17 सितंबर को सुबह 6:30 बजे से शाम 6:16 बजे तक रहेगा।
- महापुण्य काल: प्रातः 5:36 से 7:39 बजे तक
- अमृत काल: प्रातः 4:03 से 5:37 बजे तक
पूजा की विधि
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान पर आसन ग्रहण कर संकल्प लें और भगवान विष्णु का ध्यान करें।
- कलश में पंचपल्लव, सुपारी, दक्षिणा आदि स्थापित कर उस पर विश्वकर्मा जी की प्रतिमा अथवा चित्र रखें।
- पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें।
- चंदन, पुष्प और फल अर्पित कर घी का दीप प्रज्वलित करें।
- आरती और भोग के बाद क्षमा प्रार्थना करें।
भोग में बेसन व मोतीचूर के लड्डू, बूंदी, फल आदि अर्पित किए जाते हैं।
पूजन सामग्री
अक्षत, हल्दी, फूल, पान, लौंग, सुपारी, दक्षिणा, कलश, पंचपल्लव, सात प्रकार की मिट्टी, मिठाई, फल, धूप, दीपक और रक्षासूत्र पूजा के लिए आवश्यक माने गए हैं।
विशेष महत्व
इस दिन न केवल घर और दुकान की, बल्कि औज़ारों, मशीनों, वाहनों, कारखानों और फैक्ट्रियों की भी पूजा की जाती है। पहले उनकी पूरी तरह साफ़-सफ़ाई की जाती है, फिर कलावा बांधकर, पुष्प, फल और धूप अर्पित कर दीप प्रज्वलित किया जाता है।
विश्वकर्मा जयंती केवल पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि यह श्रम और कौशल की महत्ता को स्मरण कराने वाला पर्व है। जब हम अपने औज़ारों और साधनों को प्रणाम करते हैं, तब वस्तुतः हम श्रम की गरिमा और सृजन की शक्ति का वंदन कर रहे होते हैं।













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