नई दिल्ली : पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल (सेवानिवृत्त) एम. एम. नरवणे ने 2020 के भारत-चीन सीमा तनाव को लेकर उठे उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें कहा जा रहा था कि उस समय उन्हें “अकेला छोड़ दिया गया” या राजनीतिक नेतृत्व से पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।
जनरल नरवणे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह धारणा पूरी तरह गलत है। उनके अनुसार, उस पूरे संकट के दौरान न केवल सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त था, बल्कि सेना को निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता भी दी गई थी।
उन्होंने कहा कि सीमा पर तैनात बलों को स्पष्ट निर्देश थे और जमीनी हालात के अनुसार त्वरित निर्णय लेने का अधिकार कमांडरों के पास था। आत्मरक्षा की स्थिति में कार्रवाई करने की पूरी छूट मौजूद थी, ऐसे में किसी अलग “विशेष आदेश” की आवश्यकता नहीं थी।
पूर्व सेना प्रमुख ने जोर देकर कहा कि यह कहना कि उन्हें “मध्य में छोड़ दिया गया था” या “अनिश्चित स्थिति में डाल दिया गया था”, वास्तविकता के विपरीत है। उनके मुताबिक, उस समय सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व के बीच भरोसा और तालमेल पूरी तरह मजबूत था।
उन्होंने यह भी कहा कि 2020 का भारत-चीन गतिरोध निश्चित रूप से गंभीर और चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उस दौर को नेतृत्व की कमजोरी या समन्वय की कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सेना ने पूरी मजबूती और स्पष्ट दिशा में काम किया।
जनरल नरवणे के ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब उनकी संभावित पुस्तक के कुछ अंशों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि उनके विचारों को गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है।













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